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कुम्हार की अधूरी मटकी

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कुम्हार की अधूरी मटकी

एक गाँव में रघुवीर नाम का एक अनुभवी कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के सुंदर बर्तन बनाने के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। उसके हाथों से बनी मटकियाँ इतनी सुंदर और मजबूत होती थीं कि लोग उन्हें खरीदने के लिए दूर-दूर से आते थे।

एक दिन उसका युवा शिष्य मोहन एक मटकी बना रहा था। उसने बहुत मेहनत से मिट्टी को आकार दिया, लेकिन मटकी का ऊपरी हिस्सा थोड़ा टेढ़ा हो गया।

मोहन निराश होकर बोला, “गुरुजी, मेरी सारी मेहनत बेकार हो गई। इतनी देर काम करने के बाद भी मैं एक अच्छी मटकी नहीं बना पाया।”

रघुवीर ने मटकी को ध्यान से देखा और कहा, “क्या तुम इसे दोबारा ठीक करने का प्रयास करोगे?”

मोहन ने उत्तर दिया,“अब इसमें क्या सुधार होगा? इसका आकार तो बिगड़ चुका है।”

रघुवीर मुस्कुराया और बोला, “बेटा, मिट्टी का आकार बिगड़ जाना असफलता नहीं है। बिना सीखे हार मान लेना असली नुकसान है।”

उसने मोहन को मिट्टी में थोड़ा पानी मिलाने, उसे फिर से गूँथने और धैर्यपूर्वक नया आकार देने का तरीका समझाया।

मोहन ने दोबारा प्रयास किया। इस बार भी मटकी पूरी तरह सही नहीं बनी, लेकिन पहले से बेहतर थी।

अगले दिन उसने फिर अभ्यास किया। कई दिनों तक वह अपनी गलतियों को समझता रहा और उन्हें सुधारने का प्रयास करता रहा।

कुछ सप्ताह बाद मोहन ने एक सुंदर और मजबूत मटकी बनाई। उसे देखकर वह खुशी से अपने गुरु के पास पहुँचा।

उसने उत्साहित होकर कहा, “गुरुजी! आज मैंने आखिरकार एक अच्छी मटकी बना ही ली।”

रघुवीर ने मटकी हाथ में ली, उसे ध्यान से देखा और कहा,
“मोहन, आज तुमने केवल एक अच्छी मटकी बनाना नहीं सीखा है, बल्कि अपनी गलतियों से सीखना भी सीख लिया है।”

मोहन ने पूछा,“गुरुजी, क्या हर गलती हमें कुछ सिखाती है?”

रघुवीर ने उत्तर दिया,“यदि मनुष्य अपनी गलती को स्वीकार करके उससे सीखता है, तो वही गलती उसके लिए गुरु बन जाती है। लेकिन यदि वह गलती से डरकर प्रयास करना छोड़ देता है, तो उसकी सीखने की यात्रा वहीं रुक जाती है।”

समय बीतता गया। मोहन अपने काम में निपुण हो गया। अब जब भी कोई नया शिष्य छोटी-सी गलती होने पर निराश होता, तो मोहन उसे अपनी पहली मटकी की कहानी सुनाता और समझाता कि किसी भी कला में कुशल बनने के लिए धैर्य, अभ्यास और अपनी कमियों को सुधारने की इच्छा आवश्यक है।

एक दिन उसके गुरु ने प्रसन्न होकर कहा “अब तुम सचमुच एक अच्छे कुम्हार बन गए हो, क्योंकि तुम केवल मिट्टी को आकार देना ही नहीं, बल्कि अपने अनुभवों से स्वयं को बेहतर बनाना भी सीख गए हो।”

मोहन ने अपने गुरु के चरण स्पर्श किए और मन ही मन संकल्प लिया कि वह जीवन में कभी अपनी गलतियों से सीखना बंद नहीं करेगा।

शिक्षा:-गलतियाँ हमारी योग्यता का अंत नहीं, बल्कि उसे बेहतर बनाने का अवसर होती हैं। जीवन में आगे बढ़ने वाले लोग वे नहीं होते जिनसे कभी गलती नहीं होती, बल्कि वे होते हैं जो अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं, उनसे सीखते हैं और निरंतर स्वयं को बेहतर बनाते रहते हैं।

जय श्रीराम

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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