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ससुराल और मायका

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ससुराल और मायका

मेरी शादी जब हुई,तब मेरी उम्र 29 साल थी। शादी में देर इसलिए नहीं हुई कि रिश्ते नहीं आते थे। रिश्ते बहुत आए, लेकिन कहीं मुझे लड़का पसंद नहीं आया- और कहीं मैं पसंद नहीं आई। समय बीतता गया और आखिरकार मेरी शादी एक अच्छे, पढ़े-लिखे परिवार में हो गई।

मेरे पति बैंक में नौकरी करते थे। मैं उनसे कम पढ़ी-लिखी थी, लेकिन उन्होंने कभी मुझे छोटा महसूस नहीं होने दिया। शादी के शुरुआती दिन बहुत अच्छे थे। मुझे लगता था कि आखिरकार मुझे मेरा अपना घर मिल गया है।

लेकिन एक गलती मैंने धीरे-धीरे शुरू कर दी। मैं अपने मायके में अपनी हर छोटी-बड़ी बात बताने लगी। सास ने क्या कहा… ननद ने क्या किया… घर में कितना काम था… पति ने किस बात पर समझाया…सब कुछ।

मेरी बहनें मेरी बातें सुनकर कहतीं,  “तुम वहां बहू बनकर गई हो, नौकरानी बनकर नहीं।”         भाई कहते, “ज्यादा दबकर मत रहना। जरूरत पड़े तो तुरंत वापस आ जाना।” धीरे-धीरे मेरे मन में भी शक और नाराज़गी भरने लगी।

एक दिन मेरे पति ने बहुत शांत आवाज़ में कहा, “घर की हर बात बाहर मत बताया करो। छोटी बातें जब बाहर जाती हैं, तो बड़ी लड़ाई बनकर वापस आती हैं।”

मुझे उनकी बात बुरी लगी। मैंने मायके फोन करके सब बता दिया। बस… यहीं से मेरी जिंदगी बदल गई। मेरे भाई-बहनों ने मुझे समझाने के बजाय आग में घी डाल दिया। उन्होंने कहा, “तुम्हारा पति तुम्हें कंट्रोल करना चाहता है।”

कुछ दिनों बाद दोनों परिवारों के बीच इतनी कड़वाहट बढ़ गई कि बात संभालना मुश्किल हो गया। उस दिन मेरे पति ने मेरी तरफ देखा और कहा: “मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं। तुम चाहो तो अपने मायके जा सकती हो। लेकिन फैसला सोचकर करना। शादी में दो लोगों के बीच तीसरे लोगों की बातें ज्यादा हो जाएं, तो रिश्ता बचाना बहुत मुश्किल हो जाता है।”

मैं गुस्से में मायके चली आई। मुझे लगा, मेरे अपने लोग हमेशा मेरे साथ रहेंगे। लेकिन कुछ महीनों बाद तलाक हो गया। तलाक के कागज़ों पर हस्ताक्षर करते समय मेरे हाथ कांप रहे थे… मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

साल बीतते गए।

मेरे भाई अपने परिवार में व्यस्त हो गए। बहनों की अपनी दुनिया बस गई। जिन लोगों की बात मानकर मैंने अपना घर छोड़ा था, आज उनके पास भी मेरी जिंदगी के लिए समय नहीं था। और मैं…मैं अकेली रह गई।

आज कई साल बाद जब पीछे मुड़कर देखती हूं, तो समझ आता है कि मेरा पति शायद मुझे मायके से नफरत करने के लिए नहीं कहता था। वह सिर्फ इतना चाहता था कि हमारे रिश्ते की बातें हमारे बीच रहें। हर मायका गलत नहीं होता और हर ससुराल सही नहीं होता। लेकिन एक बात जरूर है-किसी भी रिश्ते का फैसला गुस्से में, दूसरों के कहने पर या अधूरी बात सुनकर नहीं करना चाहिए।

क्योंकि सलाह देने वाले लोग बाद में अपनी जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं…लेकिन आपके फैसले की कीमत आपको पूरी जिंदगी चुकानी पड़ सकती है।और कभी-कभी…एक गलत फैसला इंसान से उसका पूरा घर छीन लेता है।

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जय श्रीराम

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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