नंदी के जन्म से नंदीश्वर बनने तक की रहस्यमयी कथा
माता पार्वती हनुमान को नंदी के जन्म की कथा सुनाने लगीं। एक समय ऋषि शिलाद के मन में पुत्र प्राप्ति की इच्छा जागी।
इस संकल्प के साथ ऋषि शिलाद ने कठोर तपस्या करके महादेव को प्रसन्न किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव देवी पार्वती के साथ उनके सामने प्रकट हुए।
शिलाद ने विनम्र होकर प्रार्थना की—“प्रभु, मैं ब्रह्मचारी हूँ। अपने ब्रह्मचर्य धर्म को अक्षुण्ण रखते हुए मैं एक पुत्र चाहता हूँ। ऐसा पुत्र दीजिए, जो बड़ा होकर आपके चरणों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दे।”
महादेव ने कहा—“मुनिवर, तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी। मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में नंदिन नाम से प्रकट होऊँगा। वह किसी माता के गर्भ से जन्म नहीं लेगा।”
यह कहकर महादेव देवी पार्वती को साथ लेकर वहाँ से अंतर्धान हो गए।
इसके बाद ऋषि शिलाद अपने आश्रम लौट आए और यज्ञ की तैयारी करने लगे। लेकिन यज्ञ आरंभ होने से पहले ही यज्ञस्थल पर एक अद्भुत दिव्य बालक प्रकट हुआ।
उस बालक के तीन नेत्र, चार भुजाएँ, जटाजूट और हाथों में दिव्य अस्त्र-शस्त्र थे। उसके पूरे शरीर से अद्भुत तेज प्रकट हो रहा था। उसे देखकर ऋषि शिलाद विस्मित रह गए। वे समझ गए कि यही वह दिव्य पुत्र है, जिसके लिए महादेव ने उन्हें वर दिया था।
शिलाद ने उस बालक का नाम नंदिन रखा।
कुछ समय बाद नंदिन ने अपना दिव्य रूप त्यागकर एक सामान्य बालक का रूप धारण कर लिया। शिलाद ने उसका पुत्र के समान पालन-पोषण किया और उसे वेद, शास्त्र तथा विभिन्न विद्याओं की शिक्षा दी।
लेकिन नंदिन के जीवन में अभी एक कठिन परीक्षा आना बाकी थी।
जब नंदिन केवल सात वर्ष के थे, तब मित्र और वरुण ऋषि शिलाद के आश्रम में आए। नंदिन को देखकर उन्होंने बताया कि उसकी आयु बहुत कम है और अब वह एक वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।
यह सुनकर शिलाद शोक में डूब गए।
पिता का दुःख देखकर नंदिन ने उन्हें सांत्वना दी। उन्होंने कहा कि वे महादेव की आराधना करके मृत्यु पर विजय प्राप्त करेंगे।
इसके बाद नंदिन अकेले वन में चले गए और महादेव की कठोर तपस्या आरंभ कर दी। वे एकाग्रचित्त होकर त्र्यम्बक महादेव का ध्यान करने लगे और रुद्र-जप में स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया।
नंदिन की तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः महादेव देवी पार्वती के साथ उनके सामने प्रकट हुए।
महादेव ने नंदिन को आशीर्वाद देते हुए कहा कि अब उन्हें मृत्यु और बुढ़ापे का भय नहीं रहेगा। वे सदा महादेव के प्रिय रहेंगे और शिवगणों का नेतृत्व करेंगे।
इसके बाद महादेव ने नंदिन को अपने गणों का अधिपति नियुक्त किया। ब्रह्मा ने उनका अभिषेक संपन्न किया।
उस दिन से नंदिन नंदीश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए—महादेव के परम प्रिय, शिवगणों के अधिपति और सदैव शिव के सान्निध्य में रहने वाले दिव्य स्वरूप के रूप में। यह कहानी ‘जय हनुमान’ पेज द्वारा लिखी गई है।
इस प्रकार ऋषि शिलाद की तपस्या के फलस्वरूप नंदी के प्राकट्य और नंदीश्वर बनने की यह दिव्य कथा पूर्ण होती है।
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जय श्रीराम
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