जब सब कुछ जल गया, तब कृपा बरस पड़ी
संत नामदेव जी भगवान के ऐसे अनन्य भक्त थे, जिनका मन हर समय अपने ठाकुर जी के चरणों में लगा रहता था। संसार की वस्तुओं से उन्हें कोई विशेष मोह नहीं था। उनका विश्वास था कि जो कुछ भी है, वह सब प्रभु का दिया हुआ है और उसी का है।
एक दिन की बात है। नामदेव जी अपनी छोटी-सी कुटिया के बाहर विश्राम कर रहे थे। आधी रात का समय था। अचानक उनकी कुटिया में आग लग गई। देखते ही देखते लपटें आसमान को छूने लगीं। आसपास के लोग दौड़कर आए और चिल्लाने लगे, “नामदेव जी! आपकी कुटिया में आग लग गई है, जल्दी कुछ कीजिए!”
लेकिन नामदेव जी के चेहरे पर न चिंता थी, न घबराहट। वे शांत भाव से उठे और आग को निहारने लगे। उनके मन में एक अद्भुत भाव जागा। उन्होंने सोचा, “आज मेरे ठाकुर जी अग्नि के रूप में मेरे घर पधारे हैं। जब अतिथि घर आए तो उसे खाली हाथ कैसे जाने दूँ?”
यह सोचकर उन्होंने कुटिया के बाहर रखा अपना सामान उठाना शुरू कर दिया। जो बर्तन बाहर रखे थे, उन्हें भी आग में डाल दिया। जो कपड़े बचे थे, वे भी अग्नि को अर्पित कर दिए। लोगों ने यह दृश्य देखा तो हैरान रह गए।
एक व्यक्ति बोला, “अरे! ये क्या कर रहे हैं? जो बचा है, उसे तो बचा लीजिए।”
नामदेव जी मुस्कुराकर बोले, “जब सब कुछ प्रभु का है, तो उसे प्रभु को लौटाने में कैसी चिंता?”
लोगों ने बड़ी मेहनत से आग बुझाई, लेकिन तब तक कुटिया पूरी तरह जल चुकी थी। सभी लोग नामदेव जी को पागल समझते हुए अपने-अपने घर लौट गए।
उस रात नामदेव जी खुले आकाश के नीचे बैठकर प्रभु का नाम जपते रहे। उनके हृदय में तनिक भी दुःख नहीं था। वे बार-बार यही कहते, “हे प्रभु! आपकी जैसी इच्छा।”
कहते हैं कि भक्त के समर्पण से भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं। नामदेव जी के निष्काम प्रेम और अटूट विश्वास को देखकर ठाकुर जी भी भाव-विभोर हो गए। उन्होंने सोचा, “मेरे इस भक्त ने बिना किसी शिकायत के अपना सर्वस्व मुझे समर्पित कर दिया। अब इसकी परीक्षा पूरी हुई।”
प्रातःकाल जब गाँव वाले वहाँ पहुँचे तो आश्चर्य से उनकी आँखें खुली रह गईं। जहाँ रात को जली हुई कुटिया थी, वहाँ अब एक अत्यंत सुंदर और दिव्य कुटिया खड़ी थी। उसकी शोभा देखते ही बनती थी।
लोग दौड़कर नामदेव जी के पास आए और बोले, “महाराज! यह चमत्कार कैसे हुआ? हमें भी इसका रहस्य बताइए।”
नामदेव जी हँस पड़े और बोले, “रहस्य बहुत सरल है। पहले अपनी कुटिया में आग लगाओ, फिर जो कुछ बचा हो, उसे भी प्रभु को अर्पित कर दो।”
लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे और बोले, “आप तो बिल्कुल पागल हैं!”
नामदेव जी मुस्कुराकर बोले, “हाँ, मैं अपने ठाकुर जी का पागल हूँ। और याद रखो, ठाकुर जी दुनिया के समझदारों के नहीं, अपने प्रेम में पागल भक्तों के घर बसाते हैं।”
शिक्षा:-जब मनुष्य पूर्ण विश्वास, समर्पण और प्रेम के साथ स्वयं को भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है, तब ईश्वर उसकी हर कमी को अपनी कृपा से भर देते हैं। सच्ची भक्ति वही है, जहाँ शिकायत नहीं, केवल समर्पण होता है।
जय श्रीराम