lalittripathi@rediffmail.com
Quotes

सन्तोष की साँस

4Views

सन्तोष की साँस

सेठ राम सजीवन नगर के प्रमुख व्यवसायी थे। वे अपने पुत्र एवं पत्नी के साथ सुखी जीवन बिता रहे एक दिन अचानक उन्हें खून की उल्टी हुई और चिकित्सकों ने जाँच के उपरान्त पाया कि वे कैंसर जैसे घात रोग की अन्तिम अवस्था में हैं एवं उनका जीवन बहुत कम बचा है। यह जानकर उन्होंने अपनी सारी सम्प् अपनी पत्नी एवं बेटे के नाम कर दी।

कुछ माह बाद उन्हें महसूस हुआ कि उनके हाथ से बागडोर जाते ही उना घर में उपेक्षा आरम्भ हो गयी है। यह जानकर उन्हें अत्यन्त दुःख हुआ कि उन पर होने वाला दवाइयों, देख भाल आदि का खर्च भी सभी को एक भार नजर आने लगा है। जीवनका यह कड़‌वा सत्य उनके सामने था और दिन वे आहत मन से किसी को बिना कुछ बताये ही घर छोड़कर एक रिक्श में बैठकर कैंसर हॉस्पिटल की और रवाना हो गये। किसी का भी वक्त और भाग्य कब बदल जाता है, इंसान इससे अनभिज्ञ रहता है।

रास्तेमें  रिक्शेवाले ने उनसे कहा कि यह जगह तो कैंसर के मरीजों के उपचार के लिये है, यहाँ पर गरीब रहते हैं, जिन पर होने वाले खर्च उनके परिवारजन वहन करने में असमर्थ होते हैं, आप तो वहाँ पर दान देने जा होंगे। मैं एक गरीब रिक्शा चालक हूँ। परंतु मेरी ओरसे भी यह 50 रुपया वहाँ दे दीजियेगा। सेठजीने रुपये कि और उनकी आँखें सजल हो गयीं।

उन्होंने कैंसर हॉस्पिटल में पहुँचकर अपने आने का प्रयोजन बता दिया। वहाँ के अधीक्षक ने अस्पताल में भर्ती कर लिया। उस सेवा संस्थान में निःशुल्क दवाइयों एवं भोजन की उपलब्धता के साथ-साथ निःस्वार्थ भाव सेवा भी की जाती थी। एक रात सेठ राम सजीवनने देखा कि एक मरीज बिस्तर पर बैठे-बैठे रो रहा है। वे उस पास जाकर कन्धे पर हाथ रखकर बोले- हम सबकी नियति मृत्यु है, जो कि हमें मालूम है, तब फिर विलाप क्यों ? वह बोला- मैं मृत्यु के डरसे नहीं रो रहा हूँ। अगले सप्ताह मेरी बेटी की शादी होने वाली है, घरमें मैं ही कमाऊ व्यक्ति था, अब पता नहीं यह शादी कैसे सम्पन्न हो सकेगी। यह सुनकर सेठजी बोले। चिन्ता मत करो, भगवान् सब अच्छा करेंगे, तुम निश्चिन्त होकर अभी सो जाओ।

दूसरे दिन प्रातः सेठजी ने अधीक्षक महोदय को बुलाकर कहा- मुझे मालूम है कि मेरा जीवन कुछ दिनों का ही बाकी बचा है। यह मेरी हीरे की अँगूठी है, अब मुझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। यह बहुत कीमती है, इसे बेचकर जो रुपया प्राप्त हो, उसे इस गरीब व्यक्ति की बेटी की शादी में दे दीजिये, मैं समझूंगा कि मैंने अपनी बेटी का कन्यादान किया है और बाकी बचे हुए धन को आप अपने संस्थान के उपयोग में ले लें। इस प्रकार सेठजी ने अपने पास बचे हुए अन्तिम धन का भी सदुपयोग कर लिया।

उस रात सेठजीने सन्तोषकी साँस ली, बहुत गहरी निद्रा में सोये। दूसरे दिन जब नर्स उन्हें उठानेके लिये पहुँची तो देखा कि वे शारीरिक कष्ट, मानसिक पीड़ा, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंकी सीमा पारकर परलोक सिधार चुके हैं।

कहानी अच्छी लगे तो Like और Comment जरुर करें। यदि पोस्ट पसन्द आये तो Follow & Share अवश्य करें ।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

Leave a Reply