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सच्ची मानवता

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सच्ची मानवता

भाई …. मैंने तुम्हें कल सुबह जो थैलियां दी थी वो…

हां हां बाबा ….सिलाई कर दी मैंने जैसे आपने कहा था, रुकिए देता हूं कहकर मोहन दर्जी जो सड़क किनारे एक खाली जगह पर छायादार वृक्ष के नीचे बैठकर कपड़े सिलकर अपने परिवार का भरण पोषण करता था बोला…वाह …. बहुत सुंदर सिला है बेटा ….  देखकर बहुत अच्छा लग रहा है ।

मोहन बोला… बाबूजी ….एक बात पूछूं …

हां हां क्यों नहीं पूछो बेटा

आप इतने बड़े घर में रहते हैं मैं आपके बच्चों को भी जानता हूं मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर आप ने ये किसलिए सिलवाई हैं, ये थैलीयां तो आटे की है आपके कहने पर मैंने मजबूत भी सिल दी मगर समझ नहीं आया आपके घर में इसका क्या उपयोग होगा??

बेटा वो जो वहां फुटपाथ पर वृद्ध  बैठती है ना ये उनके लिए है मुझे उन्हें देनी है दरअसल बेटा बाहर इतनी गर्मी और धूप पड़ती है और उनका भी कोई नहीं है वह वहां बैठकर मेहनत करते हुए किसी रेहड़ी वाले के फल आदि बेचती है ताकि उनके दिन रात खाने का प्रबन्ध हो सके मैंने उन्हें कितनी ही बार कहा कि आप किसी आश्रम में चले जाओ इस उम्र में ये सब ….

बेटा बड़ी खुद्दार है बोली “अभी कमाकर पेट भर सकती हूं तो क्यों आश्रम जाऊं” आते जाते मैं ने ध्यान किया कि वह गर्मी से बचने के लिए किसी पेड़ के नीचे बैठ जाती है मैं और अधिक तो कुछ नहीं कर सकता इसलिए घर आई ये आटे की थैलियों को इकट्ठा किया और एक चादर की तरह बनवा लिया अब वहां चार बांस के सहारे लगवाने में मदद कर दूंगा ताकि वह बहन गर्मी से बच जाए, वृद्ध है तो वह बीमार भी नहीं पड़ेगी कहते हुए उन वृद्ध  ने मोहन की ओर सिलाई के पैसे बढ़ा दिए पैसे पकड़ते वक्त मोहन की आंखें भीगी हुई थी अचानक उसने जानबूझकर कुछ पैसे नीचे की ओर गिरा दिए।

पैसे  उठाते हुए उसने उन वृद्ध बाबा के चरणों को स्पर्श किया और मन ही मन बुदबुदाने लगा ….लोग दिखावा करके मददगार बनने का ढोंग करते हैं बस मगर जो दूसरों के दर्द को बिना कहे समझें और निस्वार्थ भाव से उसकी मदद करें ऐसे देवदूतों को मेरा प्रणाम … ईश्वर ऐसे ही व्यक्तियों में बसता है।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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