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बेटा

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बेटा

नवविवाहिता पत्नी बार-बार अपनी सास पर आरोप लगाए जा रही थी और उसका पति बार-बार उसको अपनी हद में रहकर बोलने की बात कह रहा था। पत्नी थी कि चुप होने का नाम ही नही ले रही थी।

जितनी बार पति उसको अपनी मां के विरुद्ध बोलने से मना कर रहा था, उतनी ही बार वह और भी तेजी से चीख- चीखकर कह रही थी,मैंने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी।

जब तुम्हारे और मेरे अलावा कोई और इस कमरे में आया ही नहीं तो अंगूठी आखिर जायेगी कहां? हो ना हो मां जी ने ही उठाई है।”

अब बात पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसने पत्नी के गाल पर एक तमाचा दे मारा।

पत्नी का सिर झनझना उठा। आंखों से आंसू झरझराकर बह उठे। अभी तीन महीने पहले ही तो दोनों की शादी हुई थी। दोनों में प्यार भी बहुत था मगर आज मां को लेकर पति ने उस पर हाथ उठा दिया था।

पत्नी से तमाचा सहन नही हुआ, वह अपने अपमान से तिलमिला उठी। पति से बोली- “मेरा इस घर में अगर इतना ही सम्मान है कि सच बोलने पर तमाचा खाना है और तुम्हारी मां तुम्हारे लिए इतनी ही अहमियत रखती हैं तो मैं घर छोड़कर जा रही हूं, तुम अपनी मां के साथ ही खुश रहो।”

पति ने तमाचा मारने के बाद पछतावा महसूस किया किंतु मां के लिए पत्नी के गलत आरोप पर उसने अपने किए को मन ही मन में सही मानकर चुप रहना ही उचित समझा।

थोड़ी देर में ही पत्नी अपना सामान बांधकर जब घर से जाने लगी तो सास से मिले दुलार और पति से अब तक मिले प्यार की भी उसे याद आ गई।

अचानक ही उसने जाते-जाते पति से पूछा- “मैं जो कुछ भी बोल रही थी, सोच समझकर बोल रही थी।

तुमने बिना मेरी बात का उत्तर दिए ही हाथ उठाकर मुझे चुप कराना चाहा, क्योंकि तुम्हारे पास मेरी बात का जवाब नहीं था।

फिर भी मैं जानना चाहती हूं कि आखिर तुमको अपनी मां पर इतना विश्वास क्यूं है..?”

तब पति ने जो जवाब दिया, उस जवाब को दरवाजे के पीछे खड़ी होकर पति- पत्नी की सारी बातें सुन रही मां ने जब सुना तो उसका मन भर आया, उसकी आंखों से आंसू गिरने लगे।
पति ने पत्नी को बताया- जानना चाहती हो तो सुनो।

जब मैं छोटा था तब पिताजी गुजर गए थे।
हमारे लिए भोजन, वस्त्र और स्कूल की फीस के लिए कोई पैसे नहीं थे।

मां मोहल्ले के घरों मे झाडू पोछा लगाकर जो कमा पाती थी उससे बड़ी मुश्किल से पेट भरता था। फिर भी मां ने मेरे लिए सारी व्यवस्था की।

मां एक खुराक खाना बनाकर एक थाली में मुझे परोस देती थी और खाली डिब्बे को ढककर रखकर कहती थी कि मेरी रोटियां इस डिब्बे में रखी हैं।

बेटा तू खा ले, मैं बाद में खा लूंगी। मुझे पता होता था कि मेरे सामने रखे खाने के अलावा कोई और खाना बचा नहीं है तो मैं भी हमेशा आधा खाना खाकर बाकी का जानबूझकर छोड़ देता था और कह देता था कि मां मेरा पेट भर गया है, मुझे और नही खाना है फिर मां मेरे आगे से बचा हुआ खाना खा लेती थी।” इस तरह मां ने मेरी जूठी बची थाली खाकर मुझे पाला पोसा और बड़ा किया है।

आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया हूं, तो यह कैसे भूल सकता हूं कि जिस मां ने उम्र के उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है, वही मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी की चोरी करेगी क्या? यह तो मैं कभी सोच भी नही सकता।

तुम तो केवल तीन महीने से मेरे साथ हो, जबकि मैंने तो अपनी मां की तपस्या को पिछले पच्चीस वर्षों से देखा है।” बोलते हुए पति का गला भर्रा गया और उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे।

पत्नी अपना अपमान और अपने गाल पर लगा तमाचा अचानक भूलकर पति को पकड़कर उसे शांत करने लगी।
उधर दरवाजे के पीछे खड़ी मां बेटे की बातें सुनकर यह समझ नही पा रही थी कि बेटा उसकी आधी रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की आधी रोटी का कर्ज…।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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