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सुविचार-सुन्दरकाण्ड-39

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जय श्री राधे कृष्ण …….

तामस तनु कछु साधन नाहीं, प्रीति न पद सरोज मन माहीं, अब मोहि भा भरोस हनुमंता बिनु हरि कृपा मिलहि नहि संता…..!!

भावार्थ:- मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं, और न मन में श्री रामचंद्र जी के चरण कमलों में प्रेम ही है । परंतु हे हनुमान ! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्री राम जी की मुझ पर कृपा है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते।…..!!

सुप्रभात

आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो..

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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