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भोजन है, बचा लो

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भोजन है, बचा लो

बहुत समय पहले की बात है। राजस्थान की धरती पर महाराज वीरेंद्र सिंह का विशाल राज्य था। एक दिन पड़ोसी राज्य के राजकुमार का विवाह था। पूरे नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया था। महल के बाहर विशाल मंडप बना था और दूर-दूर से राजा, सामंत, सैनिक तथा प्रजा विवाह समारोह में सम्मिलित होने आई थी।

महाराज ने भोजन की व्यवस्था के लिए अपने विशेष सैनिकों की एक टुकड़ी नियुक्त की थी। उसका प्रधान था सेनापति रणधीर। उसका कार्य विवाह समारोह में व्यवस्था बनाए रखना था। रणधीर अपने कुछ सैनिकों के साथ महल के एक ऊँचे बुर्ज पर खड़ा होकर पूरे विवाह समारोह पर दृष्टि रख रहा था। तभी उसकी नजर एक अधेड़ व्यक्ति पर पड़ी।

वह व्यक्ति बार-बार भोजनशाला की ओर जाता। अपनी थाली में थोड़ा-थोड़ा भोजन लेता, उतना ही खाता और फिर वापस आ जाता। कुछ देर बाद उसने भोजनशाला में खड़े सेवकों को निर्देश देना शुरू कर दिया।

रणधीर को यह बात कुछ विचित्र लगी। वह अपने एक सैनिक को बुलाकर बोला, “तुम यहाँ पहरा दो, मैं उस व्यक्ति से बात करके आता हूँ।”

रणधीर उसके पास पहुँचा और विनम्रता से बोला, “भद्र पुरुष, क्षमा करें। मैं कुछ समय से आपको देख रहा हूँ। आप विवाह में अतिथि हैं, फिर भोजनशाला की व्यवस्था में इतनी रुचि क्यों ले रहे हैं?”

वह व्यक्ति कुछ क्षण चुप रहा। फिर उसकी आँखें नम हो गईं। उसने धीमी आवाज में कहा—“सेनापति जी, चार महीने पहले मेरी पुत्री का विवाह हुआ था। मैंने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर दो हजार लोगों के लिए भोजन बनवाया था। मुझे लगा था कि बेटी का विवाह है, इसलिए किसी को किसी वस्तु की कमी नहीं होनी चाहिए।”

वह कुछ देर रुका और फिर बोला—“लेकिन व्यवस्था ठीक नहीं रही। बहुत से लोग बिना आवश्यकता भोजन लेते रहे। किसी ने थाली में थोड़ा खाया और बहुत कुछ छोड़ दिया। कुछ लोग एक साथ कई व्यंजन ले आए और आधा भोजन फेंक दिया।”

उसकी आवाज काँपने लगी। “उधर बारात देर से पहुँची। जब बाराती भोजन करने आए तो कुछ व्यंजन समाप्त हो चुके थे। मेरे समधी बहुत नाराज हुए। विवाह तो हो गया, लेकिन आज भी मेरी बेटी को ससुराल में कभी-कभी उसी भोजन की कमी का ताना सुनना पड़ता है।”

रणधीर ने उसकी ओर देखा। वह व्यक्ति आँसू पोंछते हुए बोला—“उस दिन मुझे समझ आया कि भोजन केवल अन्न नहीं होता, किसी के सम्मान और मेहनत का परिणाम भी होता है। काश, उस दिन कोई भोजन की व्यवस्था संभालने वाला होता, तो शायद मेरी बेटी को ये ताने न सुनने पड़ते।”

फिर उसने हाथ जोड़कर कहा—“अब जब भी किसी विवाह या उत्सव में जाता हूँ, भोजन की व्यवस्था पर ध्यान देता हूँ। जितना आवश्यक हो उतना ही बनवाया जाए, लोग उतना ही लें और जो भोजन बच जाए, उसे जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाए। इसलिए मैं यहाँ भी यही कर रहा हूँ।”

वह मुस्कुराया और बोला—“सेनापति जी, अनुमति हो तो मैं भोजनशाला पर थोड़ी देर और निगरानी रख लूँ?”

रणधीर की आँखें भी नम हो गईं।

उसने कहा, “आपको अनुमति माँगने की आवश्यकता नहीं। आज से आप मेरे लिए सैनिक नहीं, बल्कि अन्न के प्रहरी हैं।”

वह व्यक्ति भोजनशाला की ओर लौट गया।रणधीर उसे जाते हुए देखता रहा और मन ही मन सोचने लगा—“राज्य की रक्षा करने वाले सैनिक तो बहुत हैं, लेकिन अन्न की रक्षा करने वाले कितने हैं?”

उस दिन से महाराज ने पूरे राज्य में घोषणा करवा दी—

“थाली में उतना ही लो, जितना खा सको।अन्न व्यर्थ करना, अन्नदाता के परिश्रम का अपमान करना है।”

और तब से राजमहल में एक नई परंपरा शुरू हुई—बचा हुआ भोजन फेंका नहीं जाता था, बल्कि जरूरतमंदों तक पहुँचाया जाता था।

शिक्षा:- अन्न का एक-एक दाना किसान की मेहनत, प्रकृति की कृपा और अनेक लोगों के परिश्रम से हमारी थाली तक पहुँचता है।

इसलिए—“उतना ही लो थाली में, व्यर्थ न जाए नाली में।”

🙏 अन्न बचाएँ, अन्न का सम्मान करें

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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