भक्त और भगवान जी की अद्भुत लीला
गंगाजी किनारे बसी निषादों की बस्ती में एक झोपड़ी में दिया जल रहा था। केवट जी की आंखों में नींद नहीं थी। उसकी बूढ़ी माँ ने उसे कहानी सुनाई थी कि एक दिन अयोध्या जी से एक राजकुमार आएंगे, जिनके चरणों में सारी दुनिया का भार हल्का हो जाता है। उनकी पत्नी पूछ रही थी, इतनी रात गए नाव क्यों धो रहे हो? और केवट जी बस एक ही बात कह रहे थे, कल अगर वो आ गए और मेरी नाव गंदी मिली तो?
उन्हें नींद में भी गंगाजी की आवाज़ में एक ही नाम सुनाई दे रहा था, राम।
अगली सुबह जब सूरज अभी निकला भी नहीं था, केवट जी अपनी नाव को लेकर किनारे पर आ गये। उन्होंने अपनी नाव को ऐसे साफ किया जैसे कोई पूजा की थाली साफ करता है। टूटी हुई जगह पर नया बांस लगाया, पुराने कपड़े से उसे पोंछा। आज उन्हें मजदूरी नहीं करनी थी, आज उन्हें किसी को पार नहीं लगाना था, आज तो उन्हें खुद पार होना था।
दोपहर होने को आई। दूर वन के रास्ते से तीन आकृतियां आती दिखीं। आगे-आगे सांवला सा युवक, जिसके कंधे पर धनुष है पर चाल में कोई घमंड नहीं, माथे पर पसीना है पर आंखों में शांति है। पीछे एक देवी जैसी नारी, जो महलों में पली है पर आज नंगे पांव कांटों पर चल रही है, फिर भी उसके चेहरे पर शिकवा नहीं। और पीछे एक दूसरा युवक, जिसकी आंखें हर समय उन दोनों की रक्षा में घूम रही हैं।
निषादराज गुह दौड़ कर उनके पास गए और उनके चरणों में गिर पड़े। रामजी ने उन्हें उठा कर गले लगाया। गुह की आंखों से आंसू बह रहे थे, मेरे प्रभुजी वन में आ गए। गुह ने कहा प्रभुजी, चलिए मेरी बस्ती में विश्राम करिए। रामजी बोले, गुह, हमें गंगाजी पार जाना है, पिताजी की आज्ञा है कि हम चित्रकूट में रहें।
गुह ने मुड़ कर आवाज़ लगाई, अरे केवट, ओ केवट, कहां मर गया, देख कौन आया है।
केवट जी तो पहले से ही किनारे पर खड़े थे। वो दौड़ कर नहीं आये, वो तो जैसे खिंचे चले आये। आकर उन्होंने देखा, और देखते ही उनकी सारी सुध-बुध खो गई। उन्होंने सोचा था रामजी राजा जैसे होंगे, मुकुट होगा, पर यहां तो… पैरों में धूल, वस्त्रों में गांठ। उन्हें अपने जीवन पर पहली बार रोना आया कि हाय, मेरे प्रभुजी को ये दिन देखना पड़ा।
लक्ष्मण जी ने कहा, नाव ले आओ।
केवट जी वहीं घुटनों पर बैठ गये। उनके हाथ जुड़े थे, पर होंठों पर एक छोटी सी हंसी थी, वो हंसी जो तब आती है जब भक्त भगवान जी से छल करता है।
उन्होंने कहा, प्रभुजी, मैं आपको ले तो जाऊं, पर मैं बहुत डर गया हूं।
रामजी ने कोमलता से पूछा, किस बात से डर गए केवट?
केवट जी बोले, सुना है आपके चरणों की धूल में कुछ ऐसा है कि पत्थर भी औरत बन जाता है। मेरी तो नाव लकड़ी की है प्रभुजी। मेरी यही एक पूंजी है। इसी से मेरे बच्चे जीते हैं। अगर आपकी चरण धूल लगते ही ये भी नारी बन गई और उड़ गई, तो मैं लुट जाऊंगा। मेरे पास तो दूसरी नाव भी नहीं।
गुह को गुस्सा आ गया, अरे मूर्ख क्या बक रहा है। पर रामजी को सब समझ आ गया। ये डर नहीं है, ये तो जन्मों का प्यार है जो डर के बहाने बाहर आ रहा है।
रामजी धीरे से बोले, तो तुम क्या चाहते हो केवट?
केवट जी की आंखों से आंसू टपक पड़े। बोले, बस एक बार अपने चरण धो लेने दीजिए। मैं अपनी आंखों से देख लूंगा कि कोई जादू तो नहीं, फिर आपको बिठा लूंगा। और वो जो पानी बचेगा, वो मेरी गरीब झोपड़ी को पवित्र कर देगा।
रामजी ने अपना दाहिना पैर आगे कर दिया। लक्ष्मण जी ने देखा तो उनका गुस्सा भी पिघल गया।
केवट जी ने कांपते हाथों से गंगाजल भरा। उनकी पत्नी किनारे पर खड़ी देख रही थी, बच्चे दौड़ आए थे। केवट जी ने जब रामजी का पैर अपनी गोद में लिया, तो उनकी उंगलियां उस कोमलता को महसूस करके सिहर उठीं। इतने कोमल चरण और इतने कठोर कांटों भरे रास्ते।
वो धो रहा था, पर वो सिर्फ पैर नहीं धो रहा था। वो अपने पिता के पाप धो रहा था, अपने दादा के पाप धो रहा था। पुराण कहते हैं कि गंगाजी में नहाने से पाप धुलते हैं, पर आज गंगाजी खुद धन्य हो रही थी क्योंकि रामजी के चरणों को धोने वाला जल फिर उसी गंगाजी में मिल रहा था।
बहुत देर तक वो चरणों को सहलाता रहे। सीता जी से रहा नहीं गया, उनकी आंखों से आंसू की धारा बह निकली। उन्हें लगा, ये केवट कितना भाग्यशाली है, इसे जो सुख मिल रहा है वो तो अयोध्या में भरत जी को भी नहीं मिला।
जब चरण धुल गए, केवट जी ने वो कठौती का जल सिर पर लगाया। फिर उसने हाथ जोड़ कर कहा, अब बैठिए प्रभुजी।
रामजी, सीताजी और लक्ष्मण जी नाव में बैठे। नाव छोटी थी। सीता जी को बैठने में थोड़ी असुविधा हुई, तो केवट ने अपनी धोती का एक कोना मोड़ कर उन्हें बैठने के लिए दिया।
नाव चली। बीच गंगाजी में पहुंची तो गंगाजी की लहरें जैसे नाचने लगीं। केवट जी चप्पू नहीं चला रहे थे, वो तो जैसे समाधि में थे। कभी चप्पू चलाते, कभी मुड़ कर रामजी को देख लेते। उनकी आंखें कह रही थीं, प्रभुजी कहीं उतर मत जाना, थोड़ी देर और बैठे रहो।
उसने मन में कहा, हे गंगा मैया जी, थोड़ी धीरे बहो, आज मेरी नाव में मेरे प्रभुजी बैठे हैं। थोड़ा धीरे बहो, ताकि मैं इन्हें थोड़ी देर और देख सकूं।
उस पार किनारा आ गया। नाव रुकी। रामजी उतरे, सीता जी को हाथ देकर उतारा, लक्ष्मण जी उतरे।
रामजी के पास देने को कुछ नहीं था, वनवासी के पास क्या होता है। सीता जी ने ये देखा तो अपनी उंगली से रत्न जड़ित अंगूठी निकाली। वो जनकनंदिनी थीं, उनके पास तो अभी भी कुछ था। उन्होंने केवट जी की ओर हाथ बढ़ाया, बोलीं, भैया जी, ये ले लो, तुम्हारी मजदूरी।
केवट जी दो कदम पीछे हट गये। उन्होंने कहा, मैया जी, मुझे लज्जित मत करो। मछली पकड़ने वाले से नाई कभी पैसे नहीं लेता, नाई से धोबी नहीं लेता। हम सब एक ही बिरादरी के हैं, एक ही घाट पर रहने वाले। तो एक केवट दूसरे केवट से मजदूरी कैसे लेगा।
सीता जी ने आश्चर्य से पूछा, तुम भी केवट हो, वो भी केवट हैं, इसका क्या मतलब?
केवट जी ने रामजी की ओर देख कर कहा, मैया जी, मैं तो इस छोटी सी गंगाजी से लोगों को उस पार ले जाता हूं। पर आपके पति तो इतने बड़े भवसागर के केवट जी हैं, जो पूरी दुनिया को पार लगाते हैं। आज मैंने आपको इस गंगाजी से पार लगाया है, कल ये मुझे उस भवसागर से पार लगाएंगे। तो हमारा हिसाब बराबर हुआ। लेन-देन तो बराबर वालों में होता है, पर हमारा तो प्रेम का नाता हो गया।
रामजी ये सुनकर खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने आगे बढ़ कर केवट जी को हृदय से लगा लिया। वो दृश्य गंगाजी ने देखा, आकाश ने देखा। एक चक्रवर्ती सम्राट का बेटा, एक निषाद को गले लगा रहा है। उस गले लगने में वेदों का सारा ज्ञान, सारे उपवास, सारी तपस्या छोटी पड़ गई।
रामजी बोले, केवट, आज से तुम मेरे भाई हो। जैसे भरत, वैसे तुम।
केवट जी वहीं खड़े रहे। उनकी नाव खाली हो गई थी। रामजी वन में चले गए। पर केवट जी की आंखें तब तक उसी रास्ते पर लगी रहीं जब तक पेड़ों के पीछे वो तीनों छिप नहीं गए। फिर उन्होंने अपनी कठौती को उठाया, जिसमें अभी भी चरणामृत लगा था, और अपनी झोपड़ी की ओर चल पड़े। उस दिन के बाद उनकी नाव में जो भी बैठता, केवट जी सबसे पहले उस कठौती का जल उसके सिर पर छिड़क देते।
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जय श्रीराम