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सास की एक शर्त

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सास की एक शर्त

“बहू… इस घर की चाबी तुम्हें तभी दूँगी, जब तुम मेरी एक शर्त मानोगी।”

नई-नवेली दुल्हन काव्या ने चौंककर अपनी सास कमला देवी की ओर देखा। उसने सोचा, “शायद मांजी घर के नियम बताएँगी… सुबह चार बजे उठना होगा, सिर पर पल्लू रखना होगा या किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करनी होगी।”

काव्या ने धीरे से कहा, “जी मांजी… आपकी हर बात मानूँगी।”
कमला देवी अलमारी से चाबियों का बड़ा गुच्छा लेकर आईं। उन्होंने उसे काव्या की हथेली पर रखते हुए कहा “ये घर की चाबियाँ हैं… लेकिन मेरी शर्त सिर्फ एक है।”

“क्या शर्त है मांजी?” कमला देवी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “इस घर में कभी किसी की गलती का फैसला उसी दिन मत करना।”

काव्या को बात समझ नहीं आई।”मतलब?”
कमला देवी मुस्कुराईं। “गुस्से में इंसान गलती नहीं देखता, सिर्फ दोषी ढूँढता है। इसलिए इस घर में चौबीस घंटे का नियम है। कोई भी नाराज़गी हो, फैसला अगले दिन होगा।”

काव्या को यह बात अजीब लगी, लेकिन उसने सिर हिला दिया। कुछ दिन बाद सुबह-सुबह हड़कंप मच गया।
ससुर जी की दवा की शीशी फर्श पर टूट गई थी। वह दवा बहुत महँगी थी और उसी दिन लानी थी। कमला देवी ने कुछ नहीं कहा। घर में काम करने वाली बाई घबराकर बोली,
“मालकिन… मुझसे गलती हो गई।”
कमला देवी ने शांत स्वर में कहा, “कोई बात नहीं। आज इस बारे में कोई कुछ नहीं बोलेगा।”

काव्या हैरान रह गई।
उसे लगा, “इतनी बड़ी गलती पर भी डाँट नहीं?” अगले दिन कमला देवी ने बाई को बुलाया।
“कल तुम बहुत डर गई थीं?”
बाई रोने लगी।
“हाँ मालकिन… रातभर नींद नहीं आई।”
कमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया। “देखो, गलती दो तरह की होती है—एक लापरवाही की, दूसरी इंसान होने की। तुमने जानबूझकर नहीं तोड़ा था। आगे ध्यान रखना।” बाई रोते-रोते उनके पैर छूने लगी।

काव्या यह सब देखती रही।
एक सप्ताह बाद खुद काव्या से बड़ी भूल हो गई। उसने जल्दी में वॉशिंग मशीन में ससुर जी की ऊनी शॉल डाल दी। शॉल सिकुड़ गई। उसकी कीमत भी बहुत थी और वह ससुर जी को उनके पिता की निशानी के रूप में मिली थी। काव्या के हाथ काँपने लगे। “अब तो मांजी बहुत नाराज़ होंगी।” लेकिन कमला देवी ने वही कहा,
“आज कुछ नहीं बोलेंगे।”
उस रात काव्या रोती रही।
उसे अपनी गलती बार-बार याद आती रही। अगले दिन उसने खुद सास के सामने जाकर कहा, “मांजी… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं बहुत शर्मिंदा हूँ।”
कमला देवी ने उसे गले लगा लिया।
“देखा बहू… अगर मैं कल ही डाँट देती, तो तुम सिर्फ मेरी डाँट याद रखती। लेकिन एक रात सोचने के बाद तुम्हें अपनी गलती खुद समझ आ गई।”
काव्या की आँखों से आँसू बह निकले।
कमला देवी बोलीं, “डर इंसान को कुछ समय के लिए बदलता है, लेकिन समझ पूरी ज़िंदगी के लिए।”

समय बीतता गया। काव्या अब इस नियम को समझने लगी थी।
एक दिन अमित ऑफिस से लौटे तो बहुत चिड़चिड़े थे।
उन्होंने बिना बात किए खाना खाया और कमरे में चले गए।
काव्या को बहुत बुरा लगा।
उसने तय कर लिया कि आज वह भी उनसे बात नहीं करेगी।
इतने में कमला देवी उसके पास आईं।
“क्या हुआ?”
“मांजी, इन्होंने मुझसे ठीक से बात तक नहीं की।” कमला देवी मुस्कुराईं। “फैसला आज करोगी या कल?”
काव्या चुप हो गई। अगली सुबह अमित खुद उसके पास आए। “माफ़ करना… कल दुकान में बहुत बड़ा नुकसान हो गया था। दिमाग काम नहीं कर रहा था।”
काव्या को अपनी सास की सीख याद आ गई। अगर उसने उसी रात झगड़ा कर लिया होता, तो बात बढ़ जाती। उसने मुस्कुराकर कहा, “अब चाय पीजिए… बाकी बातें बाद में।”

कुछ महीनों बाद पड़ोस में रहने वाली एक बुज़ुर्ग महिला का बेटा उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आया।
पूरा मोहल्ला उस बेटे को कोस रहा था। काव्या भी बोली, कैसा बेटा है!” लेकिन कमला देवी ने कहा, “पूरी कहानी जाने बिना किसी पर फैसला मत करो।”
दो दिन बाद पता चला कि बेटा खुद कैंसर से जूझ रहा था और इलाज के लिए दूसरे शहर जा रहा था। उसने माँ को अकेला छोड़ने के बजाय ऐसी जगह रखा था जहाँ उनकी देखभाल हो सके।

काव्या का सिर झुक गया।
कमला देवी ने कहा, “बहू, आधा सच अक्सर पूरे झूठ से ज्यादा खतरनाक होता है। “उस दिन के बाद काव्या ने लोगों पर तुरंत राय बनाना छोड़ दिया।

साल बीत गए।

कमला देवी बूढ़ी हो गईं। एक दिन उन्होंने वही चाबियों का गुच्छा फिर से काव्या के हाथ में रखा। “आज से यह घर पूरी तरह तुम्हारा है।” काव्या की आँखें भर आईं। “मांजी, आपने मुझे चाबियाँ तो पहले ही दे दी थीं।”
कमला देवी मुस्कुराईं। “नहीं बहू… उस दिन मैंने तुम्हें सिर्फ लोहे की चाबियाँ दी थीं। आज मैं तुम्हें इस घर के रिश्तों की चाबी दे रही हूँ।” “वह कौन-सी?”
कमला देवी ने धीमे से कहा,
“जिस घर में लोग एक-दूसरे को समझने से पहले फैसला नहीं सुनाते, वहाँ रिश्ते कभी बूढ़े नहीं होते।”

कुछ वर्षों बाद जब काव्या खुद सास बनी, उसकी बहू से गलती से उसकी सबसे प्रिय चाय की केतली टूट गई।

बहू डर के मारे रोने लगी। काव्या ने मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहा, “बेटी… आज नहीं। इस घर में किसी की गलती का फैसला अगले दिन होता है।” बहू हैरान होकर उसे देखने लगी।

काव्या की आँखों में अपनी सास की छवि तैर रही थी। उसे समझ आ गया था कि घर दीवारों से नहीं, बल्कि उन नियमों से बनते हैं जो रिश्तों को टूटने से बचाते हैं।

उस दिन से उस घर में एक परंपरा शुरू हुई—गुस्से में कभी फैसला नहीं होगा। पहले एक रात गुज़रेगी, फिर बात होगी।

और शायद यही वजह थी कि उस घर में बर्तन कभी-कभी टूटते थे, लेकिन रिश्ते कभी नहीं।

जय श्री राम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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