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ईमानदारी की बही

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ईमानदारी की बही

चौबे जी पुलिस विभाग में कार्यरत एक ऐसे सज्जन थे, जिनकी पहचान उनकी सच्चाई, स्पष्टवादिता और ईमानदारी से होती थी। वे जब भी हमारी दुकान से कपड़ा उधार लेते, समय से पहले ही पूरे रुपए चुका देते। उनके व्यवहार में न कोई चालाकी थी, न ही लेन–देन में कोई अस्पष्टता।

एक बार वे फिर कपड़ा उधार लेकर अपने गाँव चले गए। उन्हें क्या पता था कि यह उनकी जीवन-यात्रा का अंतिम पड़ाव होगा। गाँव पहुँचते ही वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और स्वयं ही समझ गए कि अब बचना कठिन है।

यह समाचार जब उनके इकलौते पुत्र रामदेव को मिला, तो वह तुरंत ग्वालियर से गाँव आ पहुँचा। अंतिम समय में चौबे जी ने बेटे का हाथ थामकर अत्यंत गंभीर स्वर में कहा—रामदेव… एक बात कभी मत भूलना। मैं ग्वालियर में भूरा सेठ की दुकान से कपड़ा उधार लाया था। मेरे जाने के बाद उनके पूरे रुपए जरूर चुका देना।”

कुछ ही दिनों बाद चौबे जी की जीवन-लीला समाप्त हो गई।
रामदेव को अपनी सर्विस ज्वाइन करनी थी, इसलिए वह ग्वालियर लौट आया।

इधर हमें जब चौबे जी के स्वर्गवास का समाचार मिला, तो मन भारी हो गया। हमने सोचा—चौबे जी तो बड़े सच्चे और ईमानदार थे। यदि उनके खाते में हमारे रुपए बाकी हैं, तो भगवान की बही में भी जरूर बाकी निकल रही होगी। कहीं उन्हें इसका दंड न मिल जाए।”

बस, यही सोचकर हमने अपनी जेब से पैसे निकालकर दुकान के गल्ले में रख दिए और खाते में जमा कर दिए।

करीब पाँच–सात दिन बाद रामदेव हमारी दुकान पर आए और सीधे बोले—“पिताजी की तरफ कितने रुपए बाकी हैं?”

हमने सहजता से कहा—कुछ भी नहीं।”

वे चौंक गए। बोले—“पिताजी ने तो मरने से पहले मुझे साफ कहा था कि रुपए देकर आना।”

हम दोनों के बीच काफी बहस हुई। अंततः उन्होंने कहा—“खाता निकालकर दिखाइए।”

हमने खाता निकाल दिया।
उन्होंने जमा की तारीख देखी और हल्के से मुस्कराकर बोले—
मेरे पिताजी तो इस तारीख से दस दिन पहले ही स्वर्ग सिधार चुके थे। फिर ये रुपए कौन जमा कर गया? क्या वे स्वर्ग से आकर हिसाब चुकाने आए थे?”

हमने कहा—“खाते में जमा है, इसलिए हम रुपए नहीं लेंगे।”

वे हँसते हुए बोले—तो फिर आप झूठे हैं और आपका खाता भी झूठा है।”

उस क्षण हमें लगा—“ये सचमुच अपने पिता जैसे ही सच्चे और स्पष्टवादी पुत्र हैं।”

आख़िरकार हमने पूरी सच्चाई उन्हें बता दी और निवेदन किया—“भाई, चौबे जी हमारे मित्र थे, हमारे लिए आदरणीय थे। कृपा करके…”लेकिन वे नहीं माने।
हठपूर्वक उन्होंने पूरे रुपए हमें देकर ही दम लिया।

आज के इस घोर कलयुग में भी ऐसी मिसालें मिल जाती हैं, जो मन को श्रद्धा से भर देती हैं।
धन्य हैं ऐसे पिता, जिन्होंने जीवनभर सच्चाई का मार्ग अपनाया,
और धन्य है वह पुत्र, जिसने पितृ-आज्ञा को धर्म समझकर निभाया।
अभिमान का अंत, विनम्रता की विजय।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

1 Comment

  • इस जीवन में यदि हमने उधर लिया पैसा नहीं चुकाया तो अगले जन्म में भारी सूद के साथ चुकाना पड़ता है

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