प्रार्थना
विवेकानंद जी के पिता का देहांत हुआ। पिता मौजी आदमी थे, कुछ बचाया नहीं, जिंदगी भर लुटाते रहे। कमाया बहुत, मगर लुटाते रहे। जब मरे तो कर्ज छोड़ कर मरे। जो कुछ था वह कर्ज में चला गया। घर की हालत ऐसी हो गई कि खाने को भी दो रोटी जुटाना मुश्किल।
विवेकानंद अपनी मां को यह कहकर चले जाते कि आज मुझे किसी के घर का निमंत्रण मिला है और रास्तों पर भूखे घूमते रहते। लौट कर आते हाथ फेरते हुए, डकार लेते जबकि कहीं किसी मित्र ने निमंत्रण नही दिया होता था।
मां को कहते कि मेरा पेट भर गया है, तू फिकर मत कर, जो थोड़ा बहुत घर में है, तू भोजन कर ले क्योंकि वह इतना थोड़ा होता था कि या तो विवेकानंद भोजन कर ले या मां कर ले।
मस्त तगड़े आदमी थे, काफी भोजन चाहिए होता था। मां यह सोचकर कि बेटा भोजन करके आया है, भोजन कर लेती, जो भी घर मे रूखा-सुखा होता।
रामकृष्ण जी को खबर लगी तो रामकृष्ण ने एक दिन विवेकानंद को कहा कि “तू पागल है”, तू जा कर मंदिर में काली को क्यों नहीं कहता?…
यहां-वहां क्या भटक रहा है? एक दफा जा कर देख तो, सब मामला हल हो जाएगा। तू जा कर प्रार्थना कर।
अब रामकृष्ण जी कहे तो विवेकानंद इनकार कैसे करते ? गए। घंटा-भर लग गया। बाहर रामकृष्ण जी बैठे हैं, चबूतरे पर, राह देख रहे हैं। जब विवेकानंद बाहर निकले तो गदगद आंखों से आंसुओं की धार बह रही है, मस्ती की तरंग छाई हुई। तीन दिन के भूखे हैं, ये तो भूल ही गए हैं। बड़े आनंद-मग्न हैं। आकर रामकृष्ण जी के चरणों में गिर पड़े।
रामकृष्ण जी ने कहा: तूने कह दिया न? तूने प्रार्थना कर ली न?
विवेकानंद ने कहा: अरे! मैं तो भूल ही गया। मैं प्रार्थना में ऐसा मस्त हो गया!!
रामकृष्ण जी ने कहा: फिर से जा।
ऐसा तीन बार हुआ और तीसरी बार विवेकानंद बाहर आए और रामकृष्ण जी को देखा और कहा कि माफ करें, यह शायद मुझसे हो नहीं पायेगा। जैसे ही मैं वहां जाता हूं, मेरी प्रार्थना मुझे ऐसा घेर लेती है कि छोटी-छोटी बातें करने का सवाल ही नहीं उठता। छोटी-छोटी बातें करूं, यह बात अभद्र लगती है। यह मुझसे नहीं हो सकेगा रामकृष्ण जी। नजरें झुकाकर फिर से बोले गुरु जी, क्षमा कर दें!! यह मुझसे नहीं हो सकेगा।
रामकृष्ण जी ने छाती से लगा लिया और कहा: “इसीलिए तुझे तीन बार भेजा, मैं देखना चाहता था, क्या अब भी प्रार्थना में तू कुछ मांग सकता है या नहीं? मगर नहीं मांग सका तो तू प्रार्थना की कला सीख गया। अब मैं निश्चित हूं। तुझे प्रार्थना करना आ गई।”
प्रार्थना मांग नहीं है, हालांकि प्रार्थना शब्द का ही अर्थ हमने मांगना कर लिया है। मांगने वाले को प्रार्थी कहते हैं। वह शब्द का अर्थ ही हमने भ्रष्ट कर लिया। प्रार्थी का अर्थ मांगनेवाला नहीं, प्रार्थी का अर्थ झुकनेवाला है। प्रार्थना का अर्थ मांगना नहीं है, प्रार्थना का अर्थ अहोभाव है …
प्रार्थना मांग नहीं है, हालांकि प्रार्थना शब्द का ही अर्थ हमने मांगना कर लिया है। मांगने वाले को प्रार्थी कहते हैं। वह शब्द का अर्थ ही हमने भ्रष्ट कर लिया। प्रार्थी का अर्थ मांगनेवाला नहीं, प्रार्थी का अर्थ झुकनेवाला है। प्रार्थना का अर्थ मांगना नहीं है, प्रार्थना का अर्थ अहोभाव है …
-ओशो
क्या तुम सोचते हो, तुम्हारी प्रार्थना परमात्मा के हृदय को बदलने के लिए है? अक्सर लोग यही सोचते हैं। जब तुम मंदिर से जाते हो और कहते हो हे प्रभु, नौकरी नहीं मिलती, कि पत्नी बीमार है, कि बेटा नालायक हुआ जा रहा है, कुछ करो, तो तुम क्या कर रहे हो? तुम यह कर रहे हो कि प्रार्थना से परमात्मा का हृदय बदलने की कोशिश कर रहे हो। नहीं, यह प्रार्थना नहीं है। वस्तुतः प्रार्थना में प्रार्थना करने वाले का हृदय बदलता है; परमात्मा का हृदय बदलने का कोई सवाल नहीं है। प्रार्थना करने में ही हृदय बदल जाता है।
प्रार्थना तो हमारा धन्यवाद है; हमारी मांग नहीं। उससे हमें कुछ चाहिए थोड़े ही है। उसने हमे, हमारे मांगने के पहले ही, इतना दिया है, ये इस बात का धन्यवाद है। उसके प्रसाद का स्वीकार है, दे तो वह चुका ही है।
मेरा मानना है कि यदि हम मांगते है तो सब अच्छा अच्छा। क्या सब हरदम सुख ही रहे, ये सम्भव है,नही, प्रकृति का नियम है, सुख दुख आएंगे। प्रभु से दुख को सद्बुद्धि,शांति से हंसते हंसते सहने की ताकत मांगिये
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जय श्रीराम