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हे भगवान

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हे भगवान

कोई आवेदन नहीं किया था] किसी की सिफारिश नहीं थी] फिर भी यह स्वस्थ शरीर प्राप्त हुआ। सिर से लेकर पैर के अंगूठे तक हर क्षण रक्त प्रवाह हो रहा है….जीभ पर नियमित लार का अभिषेक कर रहा है…न जाने कौनसा यंत्र लगाया है कि निरंतर हृदय धड़कता है…पूरे शरीर हर अंग मे बिना रुकावट संदेशवाहन करने वाली प्रणाली कैसे चल रही है—–कुछ समझ नहीं आता।

हड्डियों और मांस में बहने वाला रक्त कौन सा अद्वितीय आर्किटेक्चर है, इसका किसी को अंदाजा भी नहीं है। *हजार-हजार मेगापिक्सल वाले दो-दो कैमरे*के रूप मे आँखे संसार के दृश्य कैद कर रही है। दस-दस हजार टेस्ट करने वाली जीभ नाम की टेस्टर कितने प्रकार के स्वाद का परीक्षण कर रही है। सेंकड़ो  संवेदनाओं का अनुभव कराने वाली त्वचा नाम की सेंसर प्रणाली का विज्ञान जाना ही नहीं जा सकता।

अलग-अलग फ्रीक्वेंसी की आवाज पैदा करने वाली स्वर प्रणाली शरीर मे कंठ के रूप मे है। उन फ्रीक्वेंसी का कोडिंग-डीकोडिंग करने वाले कान नाम का यंत्र इस शरीर की विशेषता है।पचहत्तर प्रतिशत पानी से भरा शरीर लाखों रोमकूप होने के बावजूद कहीं भी लीक नहीं होता… बिना किसी सहारे मैं सीधा खड़ा रह सकता हूँ..

गाड़ी के टायर चलने पर घिसते हैं, पर पैर के तलवे जीवन भर चलने के बाद आज तक नहीं घिसे अद्भुत ऐसी रचना है।

हे भगवान तू इसका संचालक है तू हीं निर्माता। स्मृति, शक्ति, शांति ये सब भगवान तू देता है। तू ही अंदर बैठ कर शरीर चला रहा है। अद्भुत है यह सब, अविश्वसनीय। ऐसे शरीर रूपी मशीन में हमेशा तू ही है, इसका अनुभव कराने वाला आत्मा भगवान तू है।

यह तेरा खेल मात्र है। मै तेरे खेल का निश्छल, निस्वार्थ आनंद का हिस्सा रहूँ!…ऐसी सद्बुद्धि मुझे दे!!

तू ही यह सब संभालता है इसका अनुभव मुझे हमेशा रहे!!! रोज पल-पल कृतज्ञता से तेरा ऋणी होने का स्मरण, चिंतन हो, यही भगवान के चरणों में प्रार्थना है।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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