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भगवान् से क्या माँगे?

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भगवान् से क्या माँगे?

भगवान् से माँगने के सम्बन्ध में एक कथा आती है कि एक बार भगवान् कृष्ण अर्जुनको साथ लेकर घूमने निकले। जाते-जाते घने जंगल में जा पहुँचे। कुछ और आगे बढ़े तो वहाँ पर सुनसान मैदान आ गया, कोई पेड़-पौधा नहीं। ग्रीष्म ऋतु थी, बड़ी गरम हवा चल रही थी। अर्जुन को तीव्र प्यास लगी, लेकिन् कहीं पानी दिखायी नहीं दे रहा था। उन्होंने भगवान् से अपने प्यासकी बात बतायी तो भगवान्ने कहा कि पता लगाओ। तलाशने पर जब दूर एक झोपड़ी दिखायी दी तो अर्जुन को वहाँ जानेके लिये कहा। अर्जुन ने वहाँ जाकर देखा कि एक संन्यासिनी, तपस्विनी, वृद्धा माँ बैठी है और उसके पास पानी का घड़ा रखा है। अर्जुनके जान में जान आयी। वे संन्यासिनी से अनुमति लेकर जल पीकर तृप्त हो गये। अर्जुन जब पानी पीकर स्वस्थ हो गये तब देखते हैं कि कुटिया में खूँटी पर एक नंगी तलवार लटक रही है। अर्जुनने मन-ही-मन सोचा कि अस्सी वर्षकी अवस्थावाली तपस्विनी बुढ़ियाने अपने पास तलवार क्यों टांग रखी है? संदेह निवारणार्थ उन्होंने पूछ ही लिया कि ‘मइया! तूने यह तलवार क्यों टांग रखी है? इसका क्या प्रयोजन?’ इसपर वह गुस्सेमें आकर बोली, ‘तुम जानना चाहते हो तो सुनो, इसे इसलिये टांग रखा है कि यदि अर्जुन और द्रौपदी मिल जायें तो उनके सिर काट लूँ।’ अर्जुन अवाक् रह गये और भयभीत भी हुए परन्तु अपने को छिपाकर बड़ी विनम्रतासे पूछा कि, ‘माँ! अर्जुन और द्रौपदीने तुम्हारा क्या कसूर किया? ऐसा कौन-सा अपराध हो गया कि तुम जैसी तपस्विनी उन दोनों का वध करनेको तैयार हो?’ वृद्धा माँने उत्तर दिया कि, ‘तुम नहीं जानते किन्तु द्रौपदीने बहुत बड़ा अपराध किया है। उसने मेरे स्वामी भगवान् को अपनी साड़ी बनायी और वह भी रजस्वलाकी साड़ी। संसार में सभी नंगे पैदा होते हैं, वह भी नंगे मर जाती परन्तु उसने क्यों मेरे भगवान् को रजस्वलाकी साड़ी बना दिया? इतना बड़ा अपराध है उसका कि यदि वह मुझे मिल जाये तो उसे मार डालूँ।’ फिर अर्जुनने कहा, ‘माँ, तुम्हारी यह बात ठीक है परन्तु अर्जुनने क्या अपराध किया?’ फिर, वृद्धा माँने उत्तर दिया कि अर्जुन उससे बड़ा अपराधी है। जिनकी पूजा करनी चाहिये उनसे घोड़े चलवाये। जिनको अर्घ्य देना चाहिये या जिनके चरणोंमें बैठकर सेवा करनी चाहिये, उस भगवान् को अपना सारथी बनाया। उनके हाथों में चाबुक और लगाम दे दी। इसलिये वह भी अपराधी है।

अर्जुन ने समझ लिया कि माई तो ठीक कहती है और फिर चुपचाप भगवान् कृष्णके पास आकर सारा वृत्तान्त सुनाया। भगवान्ने कहा, ‘तुम्हीं सोचो, क्या ठीक है? हम तो तुम्हारे हैं ही।’ इसलिये भगवान् से सामान्यतः कुछ न चाहें परन्तु हाँ, एक बड़ी सुन्दर बात को याचना भाव से, भगवान् को आत्मसमर्पित करके कुछ कह दे कि-‘नाथ! बस, तुम्हारी इच्छा पूरी हो।’

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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