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भगवान के घर दर है, अंधेर नहीं है

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भगवान के घर देर है,अंधेर नहीं

एक व्यक्ति की मृत्यु हुई, तो उसे परलोक में धर्मराज के समक्ष प्रस्तुत किया गया। धर्मराज ने उसके संबंध में चित्रगुप्त से पूछताछ की, तो पता चला कि वह स्वर्ग में उच्च स्थान का अधिकारी है। धर्मराज के इशारे पर दूत उसे ले जानें लगे, तो उसने विनीत स्वर में पूछा- ’राजन्। मैंने जीवन में ऐसा कोई पुण्य तो किया नहीं, फिर इस पुरस्कार का निमित्त जान सकता हूँ?’

न्यायाधिपति बोल पड़े- ’तुमने तो जीवन भर औरों की पूजा की जो सेवा सहायता की है, उसी का पारितोषिक तुम्हें मिल रहा है। ’

इसके उपराँत दरबार में एक कुत्ते को पेश किया गया। न्यायकर्ता ने श्वान की ओर इशारा करते हुए उस व्यक्ति से पूछा-’इसे पहचानते हो?’ अस्वीकृति में उसका सिर हिल गया। अब धर्मराज बोले- ’यह तुम्हारे ही गाँव का धनीराम बनिया है। आजीवन यह बेईमानी और मिलावट खोरी कर लोगों को ठगता रहा। इसी का दण्ड इसे इस रूप में मिला है। ‘

शिक्षा:-सचमुच, भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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