ससुर या पिता
ससुर या पिता "बेटा तू बच्चों का नाश्ता बना इतने मैं इन्हे तैयार कर देता हूं फिर तू वत्सल का लंच लगा दियो मैं इन्हे बस तक छोड़ आऊंगा!" नरेश जी अपनी बहू दिव्या से बोले। "नहीं नहीं पापा जी...
ससुर या पिता "बेटा तू बच्चों का नाश्ता बना इतने मैं इन्हे तैयार कर देता हूं फिर तू वत्सल का लंच लगा दियो मैं इन्हे बस तक छोड़ आऊंगा!" नरेश जी अपनी बहू दिव्या से बोले। "नहीं नहीं पापा जी...
हम हाथी नहीं इंसान हैं एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया। उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस...
अतृप्त मन असंतोषी मन इस संसार का सबसे दुःखी मन है। जिस मन में संतोष नहीं वह बहुत कुछ प्राप्ति के बावजूद भी अतृप्त ही रहेगा। धन के बल पर भोग अवश्य प्राप्त हो जाते हैं मगर तृप्ति की प्राप्ति...
सेवा भी आराधना है अपेक्षारहित अथवा निस्वार्थ सेवा भी ईश्वर की आराधना का एक रूप है। यदि जीवन में सेवा का सौभाग्य मिलता हो तो सेवा सभी की करना लेकिन आशा किसी से भी न रखना क्योंकि सेवा का वास्तविक...
स्वामी विवेकानंद और वैश्या विवेकानन्द राजस्थान के एक रजवाड़े खेतरी के महाराजा के मेहमान थे। अमरीका जाने के पहले की बात है अब महाराज तो महाराजा ! अब विवेकानंद का स्वागत कैसे करें और अमरीका जाने वाला पहला सन्यासी, स्वागत...
पुण्यकोटी-गाय कलिंग नामक एक ग्वाला पहाड़ के निकट अपनी गायों के साथ बहुत सुख-सन्तोष से रहता था। उसकी गायों में पुण्यकोटि नाम की एक गाय थी, जो अपने बछड़े को बहुत प्यार करती थी। प्रतिदिन संध्या समय वह रंभाती और...
तुलसीदास और श्री राम मिलन काशी में एक जगह पर तुलसीदास रोज रामचरित मानस को गाते थे वो जगह थी अस्सीघाट। उनकी कथा को बहुत सारे भक्त सुनने आते थे। लेकिन एक बार गोस्वामी प्रातःकाल शौच करके आ रहे थे...
श्रद्धा :-लड्डू गोपाल एक लड़की थी……उसे अपने घर के संस्कारो की वजह से लड्डू गोपाल की भक्ति मिली…उस लड़की की बड़ी आस्था थी लड्डू गोपाल में….वह लड़की हमेशा वृन्दावन जाती थी और लड्डू गोपाल के दर्शन कर के आती थी….!...
संयम एक युवती ट्रेन में चढ़ी और उसने अपनी सीट पर एक आदमी को बैठे देखा। उसने विनम्रता से अपना टिकट चेक किया और कहा, "सर, मुझे लगता है कि आप मेरी सीट पर हैं।" उस आदमी ने अपना टिकट...
ईश्वर का न्याय एक रोज रास्ते में एक महात्मा अपने शिष्य के साथ भ्रमण पर निकले। गुरुजी को ज्यादा इधर- उधर की बातें करना पसंद नहीं था, कम बोलना और शांतिपूर्वक अपना कर्म करना ही गुरू को प्रिय था। परन्तु...