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ये दुनिया है

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ये दुनिया है

शहर के सबसे सम्मानित और दयालु व्यक्ति सेठ मोहनचंद का अचानक निधन हो गया। यह समाचार पूरे शहर में आग की तरह फैल गया। जिसने भी सुना, उसकी आँखें नम हो गईं। आखिर सेठ जी ने अपना पूरा जीवन दूसरों की मदद करने में बिताया था। किसी गरीब बेटी की शादी हो, किसी बीमार का इलाज, किसी विद्यार्थी की फीस या किसी भूखे को भोजन—सेठ जी ने कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाया।

उनके विशाल घर के बाहर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा। हर कोई कह रहा था, “ऐसा इंसान अब कहाँ मिलेगा?” देखते ही देखते हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुँच गए। फूलों से सजी अर्थी तैयार थी। हर कोई उनके गुण गा रहा था।

तभी आसमान में काले बादल छा गए और तेज़ बारिश शुरू हो गई।

पहले हल्की फुहार थी, फिर मूसलाधार वर्षा होने लगी। कुछ ही मिनटों में भीड़ छँटने लगी। जो लोग थोड़ी देर पहले सेठ जी के गुणों के पुल बाँध रहे थे, वे अपने कपड़े बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। कोई दुकान की छत के नीचे खड़ा हो गया, कोई अपने घर की ओर दौड़ पड़ा।

करीब एक घंटे तक बारिश नहीं रुकी। आखिर परिवार ने निर्णय लिया कि जो लोग छाता लेकर आएँगे, वही अंतिम यात्रा में शामिल होंगे।

जब अर्थी दोबारा उठी तो दृश्य देखकर हर किसी का दिल भर आया। हजारों लोगों की भीड़ में अब केवल दस लोग बचे थे। चार लोग अर्थी को कंधा दे रहे थे और छह लोग चुपचाप पीछे चल रहे थे। बाकी सब अपने-अपने घर लौट चुके थे।

यह दृश्य देखकर सेठ जी का सबसे छोटा बेटा रो पड़ा। तभी उसके दादाजी के पुराने मित्र ने उसके कंधे पर हाथ रखा और धीमे स्वर में बोले—”बेटा, यही दुनिया का सबसे बड़ा सच है। जिन लोगों के लिए तुम्हारे पिता ने पूरी ज़िंदगी लगा दी, आज वे बारिश में एक छाता लेकर भी उनके साथ नहीं चल सके।”

लड़के ने आँसू पोंछते हुए पूछा, “तो क्या लोगों के लिए अच्छा करना गलत है?”

वृद्ध मुस्कुराए और बोले, “नहीं बेटा, अच्छा करना कभी गलत नहीं होता। लेकिन अपनी पूरी ज़िंदगी केवल इस डर में मत बिताना कि लोग क्या कहेंगे, लोग क्या सोचेंगे। लोगों की खुशी के लिए अपना सुख, अपना समय और अपनी शांति मत खो देना। क्योंकि दुनिया ज़रूरत पड़ने पर साथ देती है, हर परिस्थिति में नहीं।”

उस दिन सेठ मोहनचंद की अंतिम यात्रा ने पूरे शहर को एक ऐसी सीख दी, जिसे कोई कभी नहीं भूल पाया।

शिक्षा:- दूसरों की मदद अवश्य करें, प्रेम और दया से जीवन जिएँ, लेकिन अपनी खुशियों का निर्णय दूसरों की सोच पर कभी मत छोड़िए। जो लोग आज आपकी प्रशंसा करते हैं, वे हर मोड़ पर आपके साथ रहें, यह ज़रूरी नहीं। इसलिए अपने जीवन को अपने सिद्धांतों और अपने आत्मसम्मान के साथ जिएँ, क्योंकि अंततः यह दुनिया कभी पूरी तरह आपकी नहीं होगी।

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जय श्रीराम

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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