lalittripathi@rediffmail.com
Quotes

सत्संग

66Views

सत्संग

एक गाँव में धर्मदास नाम का व्यक्ति रहता था। वह रोज सुबह-सुबह मंदिर के बड़े से प्रांगण में होने वाले सत्संग में पहुँच जाता। महाराज जी जब भी कथा या प्रवचन देते, धर्मदास सबसे आगे बैठकर बहुत ध्यान से सुनता, बार-बार सिर हिलाता और जब सत्संग समाप्त होता तो जोर-जोर से तालियाँ बजाता।

गाँव के लोग समझते थे कि धर्मदास बहुत बड़ा ज्ञानी और भक्त बन गया है, क्योंकि उसने पिछले बीस वर्षों में एक भी सत्संग नहीं छोड़ा था।
लेकिन धर्मदास के घर की सच्चाई कुछ और ही थी। सत्संग से लौटते ही वह अपने घर के छोटे-छोटे काम करने वालों पर चिल्लाता, अपने बूढ़े माता-पिता से कड़वे वचन बोलता और पड़ोसियों से छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा कर लेता। उसके मन में मोह, लोभ और अहंकार कूट-कूटकर भरा हुआ था।

एक दिन सत्संग खत्म होने के बाद धर्मदास महाराज जी के पास पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला, “महाराज जी! मैं पिछले बीस सालों से लगातार आपका सत्संग सुन रहा हूँ। मुझे तो शास्त्र और नीतियाँ सब याद हो गई हैं, फिर भी मुझे मन की शांति क्यों नहीं मिलती? मुझे पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति क्यों नहीं हुई?”
महाराज जी धर्मदास के स्वभाव और व्यवहार से भली-भांति परिचित थे। वे मुस्कुराए और उन्होंने धर्मदास से कहा, “धर्मदास! आज मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर एक छोटे से काम के माध्यम से दूँगा। तुम सामने नदी किनारे जाओ और इस कोयले से भरी टोकरी में पानी भरकर ले आओ।”

धर्मदास थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन महाराज जी की आज्ञा मानकर टोकरी लेकर नदी की ओर चला गया। टोकरी में तो बड़ी-बड़ी जालियाँ और छेद थे। उसने जैसे ही टोकरी को पानी में डुबोकर बाहर निकाला, सारा पानी बहकर निकल गया। उसने बार-बार प्रयास किया, लेकिन हर बार पानी रास्ते में ही बह जाता और टोकरी खाली रह जाती।
थक-हारकर धर्मदास महाराज जी के पास लौटा और बोला, “महाराज! इस टोकरी में तो पानी रुक ही नहीं सकता। इसमें छिद्र हैं, सारा पानी बह जाता है।”

महाराज जी ने बड़े शांत स्वर में कहा, “धर्मदास, ध्यान से देखो! भले ही टोकरी में पानी नहीं रुका, लेकिन बार-बार पानी में डूबने से कोयले की सारी कालिख धुल गई और टोकरी अंदर-बाहर से पूरी तरह साफ हो गई।”
फिर महाराज जी ने धर्मदास के कंधे पर हाथ रखा और समझाया:
“सत्संग भी इस जल की तरह है। तुम रोज सत्संग सुनने आते हो, लेकिन जैसे ही बाहर निकलते हो, तुम्हारे अंदर के अहंकार, क्रोध और द्वेष के छिद्र उस ज्ञान रूपी जल को बहा देते हैं। तुम सत्संग को केवल ‘सुनते’ हो, उसे जीवन में ‘गुंथते’ (आचरण में लाते) नहीं हो। सत्संग का अर्थ केवल कान से सुनना नहीं, बल्कि मन की कालिख को धोना और अपने व्यवहार को बदलना है।”

यह सुनते ही धर्मदास की आँखें खुल गईं। उसे समझ आ गया कि ज्ञान बातें याद करने में नहीं, बल्कि अपने अहंकार को मिटाने और दूसरों के प्रति प्रेम व दया भाव रखने में है।
उसी दिन धर्मदास ने अपने आचरण को बदला। वह जान गया कि जब तक विचार आचरण में न ढलें, तब तक हजार सत्संग सुनने पर भी ज्ञान नहीं आता।
कहानी की सीख (निष्कर्ष)
सत्संग केवल कानों का रस नहीं है, बल्कि जीवन को सुधारने का साधन है। ज्ञान किताबों या प्रवचनों को याद करने से नहीं, बल्कि अपने भीतर के विकार (क्रोध, लोभ, अहंकार) मिटाने और अच्छे व्यवहार को अपनाने से आता है..!!
जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

Leave a Reply