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ना’ सुनने की आदत

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ना‘ सुनने की आदत

इंदौर मे रहते हुए काफी समय हो गया। कल एक मॉल गया था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, लोग जल्दी-जल्दी अंदर-बाहर आ-जा रहे थे।

गेट के पास एक छोटा बच्चा खड़ा था। मुश्किल से आठ साल का होगा। हाथ में चिप्स के कुछ पैकेट और गले में एक छोटा-सा बोर्ड लटका था। बोर्ड पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था – “स्काउट चैरिटी के लिए, सिर्फ 20/ में

लोग उसके बगल से गुजर रहे थे। किसी को जल्दी थी, कोई फोन पर था, कोई देखकर भी अनदेखा कर रहा था। लेकिन वो बच्चा… वो हार नहीं मान रहा था।

वो हर आने-जाने वाले के पास अपनी छोटी-छोटी टांगों से चलकर जाता, ऊपर देखता और बड़ी मासूमियत से पूछता, “क्या आप एक पैकेट खरीदेंगे?”

कोई खरीद लेता। कोई मुस्कुराकर कहता, “नहीं बेटा, थैंक यू।”

मैंने सोचा, इतना छोटा बच्चा, इतनी बार ‘ना’ सुनकर रो देगा, उदास हो जाएगा, अपनी टीचर के पीछे छिप जाएगा। लेकिन नहीं।

वो हर ‘ना‘ के बाद मुस्कुराता, हल्के से सिर हिलाता और अगले व्यक्ति की तरफ मुड़ जाता। उसके चेहरे पर न शर्म थी, न डर, न निराशा। सिर्फ एक अजीब-सा आत्मविश्वास था।

मुझसे से रहा नहीं गया। उससे एक पैकेट खरीद लिया। बच्चे की आँखें चमक उठीं। उसने उछलकर कहा, “थैंक यू सो मच!”

फिर मैंने ने प्यार से पूछा, “तुम्हें और कितने पैकेट बेचने हैं? तुम यहाँ कब तक खड़े रहोगे?”

बच्चे ने जो जवाब दिया, उसने मुझको अंदर तक हिला गया।  उसने कहा, “जब तक 100 लोग मुझे NO नहीं कह देते, तब तक!”

मैं हैरान रह गया। उसने बगल में खड़ी टीचर की तरफ देखा। टीचर मुस्कुराईं और बोलीं,  “हमारा मकसद पैकेट बेचना नहीं है। हमारा मकसद है कि ये बच्चा इस उम्र में ‘ना‘ सुनना सीखे। ‘ना‘ को सुनकर उसे स्वीकार करना सीखे, और फिर भी अगले इंसान से पूछने की हिम्मत रखे।”

सुनकर मैं चुप हो गया।

हम अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं?

खूब पढ़ो, फर्स्ट आओ, कॉम्पिटिशन जीतो, सिलेक्ट हो जाओ, सबसे आगे निकलो।

हम उन्हें जीतना सिखाते हैं। लेकिन हम उन्हें हारना नहीं सिखाते।

हम उन्हें सफलता का रास्ता दिखाते हैं, लेकिन असफलता से गुजरने की हिम्मत नहीं देते।

जबकि जिंदगी में सबसे ज्यादा जरूरत उसी हिम्मत की पड़ती है।

क्योंकि जिंदगी हमेशा ‘हाँ’ नहीं कहेगी।

कुछ एग्जाम छूट जाएंगे। कुछ इंटरव्यू क्लियर नहीं होंगे। कुछ बिजनेस फेल होंगे। कुछ रिश्ते टूटेंगे। कुछ सपने देर से पूरे होंगे।

उस दिन जो ‘ना’ मिलेगा, वो हमें तोड़ भी सकता है और बना भी सकता है। फर्क सिर्फ इतना होगा कि हमने बचपन में ‘ना’ से दोस्ती की है या दुश्मनी।

वो पाँच साल का बच्चा  मॉल के बाहर चिप्स नहीं बेच रहा था। वो हिम्मत बेच रहा था। वो ‘ना‘ इकट्ठा कर रहा था। वो रिजेक्शन को गले लगाना सीख रहा था। वो जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा की तैयारी कर रहा था – गिरकर उठने की परीक्षा।

सोचिए, अगर हमारा बच्चा 10वीं में फेल हो जाए तो हम क्या करते हैं? डांटते हैं, ताना मारते हैं, शर्मा जाते हैं।

अगर वो इंटरव्यू में रिजेक्ट हो जाए तो हम कहते हैं, “तुमसे नहीं होगा।”

हम अनजाने में उसे सिखा देते हैं कि ‘ना’ का मतलब है – तुम बेकार हो।

जबकि उस टीचर ने सिखाया कि ‘ना’ का मतलब है – अभी नहीं, फिर कोशिश करो।

दोस्तों, सफलता हमें खुशी देती है, लेकिन ‘ना’ को संभालना हमें जिंदगी देता है।

आज से अपने बच्चों से सिर्फ ये मत पूछिए, “बेटा, जीते या हारे? कितने मार्क्स आए?”

कभी-कभी ये भी पूछिए, “बेटा, आज कितनी बार ‘ना’ सुना? और फिर भी तुमने कोशिश की? मुझे तुम पर गर्व है।”

ऐसे बच्चे मत पालिए जो सिर्फ जीतने से खुश हों। ऐसे बच्चे पालिए जो हारने से डरते न हों ।

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जय श्रीराम

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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