हनुमान अंश–ठौर
हनुमान अंश की कथा का सबसे कोमल और सबसे गहरा सूत्र जो मेरे समक्ष खुलता है वह यह कि एक बच्चे के लिए ‘राम के पास जाना’ पहले धर्म का प्रश्न नहीं, माँ तक पहुँचने का प्रश्न है। माँ की मृत्यु को उससे यह कहकर समझाया गया कि वह राम के पास चली गई हैं। बच्चे ने मृत्यु को मृत्यु की तरह नहीं समझा; उसने उसे एक यात्रा की तरह समझा—माँ कहीं गई हैं, और जिस दिन वह बड़ा होगा, वह उस जगह को खोज लेगा जहाँ माँ पहुँची हैं। इसीलिए उसकी आध्यात्मिक यात्रा वास्तव में आरम्भ से ही एक मातृ-अन्वेषण है।
पिता की दूसरी शादी उस खोज को और गहरा कर देती है। बच्चे के लिए घर अब वह घर नहीं रह जाता जिसमें माँ की स्मृति सुरक्षित थी। एक ओर माँ की अनुपस्थिति है, दूसरी ओर उसी घर में किसी दूसरी स्त्री की उपस्थिति। बालमन इतना तर्कशील नहीं होता कि मृत्यु और पुनर्विवाह के बीच सामाजिक समझौते को स्वीकार कर ले; वह बस इतना जानता है कि जिस घर में माँ नहीं है, वह उसका घर नहीं है। तब वह उस माँ को खोजने निकलता है जो उसके विश्वास में राम के पास है। उसकी यात्रा बाहर की दुनिया में है, लेकिन उसकी असली यात्रा भीतर के उस रिक्त स्थान की है जिसे माँ छोड़ गई है।
और यहीं फिल्म की करुणा असाधारण रूप से मधुर हो जाती है। वह बच्चा राम को इसलिए नहीं खोज रहा कि उसे मोक्ष चाहिए; वह राम को इसलिए खोज रहा है क्योंकि उसे अपनी माँ चाहिए। उसके लिए ईश्वर की पहली कल्पना दर्शनशास्त्र से नहीं, वियोग से बनी है। वह जानता ही नहीं कि वह आध्यात्मिक यात्रा पर है। उसे तो लगता है कि दुनिया में कहीं एक ऐसी जगह अवश्य होगी जहाँ उसकी माँ है—और यदि माँ वहाँ है तो वहाँ तक पहुँचना ही जीवन का सबसे बड़ा प्रयोजन है।
इस दृष्टि से उसके भटकने में एक अद्भुत बाल-सादगी है। वह जिस-जिस ठौर जाता है, मानो अपने मन में पूछता चलता है—क्या माँ यहाँ है? क्या राम यहाँ हैं? क्या यही वह जगह है जहाँ मुझे पहुँचना था? लेकिन जीवन उसे कोई स्थायी उत्तर नहीं देता। घर छूट गया, फिर रास्ते मिले; रास्ते छूटे, फिर जंगल मिले; जंगलों के पार मंदिर मिले; मंदिरों के पार साधु मिले। वह ठौर खोजता रहा, पर हर ठौर अस्थायी निकला।
और शायद यही उस कथा का सबसे मार्मिक रूपक है—जिस बच्चे ने माँ को खोया था, वह धीरे-धीरे ठौर की तलाश में स्वयं को खोता चला गया।
लेकिन भारतीय आध्यात्मिक कथा की करुणा यहाँ जाकर निराशा नहीं बनती। क्योंकि मनुष्य जब संसार में ठौर नहीं पाता, तब कभी-कभी उसे ऐसा ठौर मिलता है जो स्थान नहीं होता—आश्रय होता है। उसे कोई घर नहीं मिलता, लेकिन कोई हृदय मिल जाता है। कोई अपना नहीं मिलता, लेकिन कोई ऐसा मनुष्य मिल जाता है जिसके पास बैठकर पहली बार उसे लगता है कि उसे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं।
यहीं ‘राम के पास जाना’ अपनी पहली बाल-व्याख्या से निकलकर दूसरी, कहीं अधिक गहरी अर्थ-भूमि में प्रवेश करता है। बच्चा राम को बाहर किसी स्थान पर खोज रहा था; जीवन धीरे-धीरे उसे सिखाता है कि राम कोई दूर का ठिकाना नहीं, वह ठौर हैं जहाँ भटकता हुआ मन पहली बार अपने को अनाथ नहीं समझता।
इसलिए फिल्म का यह बालक जितना माँ को खोजता है, उतना ही वह ‘ठौर’ की खोज करता है। उसकी यात्रा में भूगोल बदलते रहते हैं, पर उसकी आवश्यकता नहीं बदलती। उसे कोई चाहिए जो कहे—तुम्हें अब कहीं और जाने की जरूरत नहीं। और जब अंततः उसे भगवान का सान्निध्य मिलता है, तब कथा का अर्थ केवल यह नहीं रह जाता कि एक बालक अपनी आध्यात्मिक मंज़िल तक पहुँच गया। अर्थ यह हो जाता है कि जिसे संसार ने ठिकाना नहीं दिया, उसे ईश्वर ने ठौर दे दी।
इसमें ‘ठौर’ शब्द कितना सुंदर है। ‘घर’ से भी अधिक आत्मीय और ‘स्थान’ से भी अधिक मानवीय। घर दीवारों से बन सकता है; ठौर विश्वास से बनती है। स्थान शरीर को टिकाता है; ठौर मन को। और जिस बच्चे का घर उसकी आँखों के सामने बदल गया था, उसे अंततः ऐसी ठौर मिलती है जिसे कोई दूसरी शादी, कोई मृत्यु, कोई बिछोह, कोई यात्रा उससे छीन नहीं सकती।
माँ ने उससे कहा नहीं था कि राम तुम्हें मिलेंगे। उसे तो केवल इतना बताया गया था कि माँ राम के पास चली गई है। लेकिन बालक ने उस एक वाक्य को अपना जीवन बना लिया। वह माँ की स्मृति को रास्ता समझकर चलता रहा और अंततः जिस राम तक पहुँचा, वहाँ उसे केवल ईश्वर नहीं मिला—उसे वह आश्रय मिला जिसकी खोज में वह घर से निकला था।
और इसीलिए इस कथा को एक दूसरी तरह से भी पढ़ा जा सकता है—माँ का जाना उसके जीवन का पहला वियोग था, लेकिन उसी वियोग ने उसके भीतर ईश्वर के लिए जगह बनाई। यदि माँ रहतीं, तो शायद राम उसके लिए मंदिर की मूर्ति होते; माँ चली गईं, तो राम उसकी खोज बन गए। कभी-कभी जीवन जिस जगह रिक्तता बनाता है, उसी जगह से किसी बहुत बड़े अर्थ का जन्म होता है।
यहाँ भक्ति भी कितनी मानवीय हो जाती है। वह किसी शास्त्रीय उपदेश से पैदा नहीं हुई; वह वियोग से पैदा हुई है। भारतीय भक्ति की पूरी परंपरा में विरह इसलिए इतना महत्त्वपूर्ण है—क्योंकि अनुपस्थिति कभी-कभी उपस्थिति की सबसे तीव्र आकांक्षा बना देती है। बच्चा माँ को खोजते-खोजते राम तक पहुँचता है; लेकिन पहुँचकर पता चलता है कि वह केवल राम को नहीं खोज रहा था। वह उस प्रेम को खोज रहा था जो उसे बिना शर्त स्वीकार कर ले।
इसलिए फिल्म की सबसे करुण पंक्ति शायद कही हुई कोई पंक्ति नहीं, बल्कि पूरी यात्रा स्वयं है—जिसे बचपन में बताया गया था कि उसकी माँ राम के पास चली गई है, वह माँ को खोजने राम तक चला गया।और यात्रा का उत्तर इससे भी अधिक मधुर है—वह माँ को तो नहीं पा सका, लेकिन उसे वह ठौर मिल गई जहाँ माँ की स्मृति भी अनाथ नहीं रहती।
यही हनुमान अंश के बालक की आध्यात्मिक कथा को साधारण ‘संत की जीवन-कथा’ से अलग कर देता है। यहाँ संत बनने से पहले एक बच्चा है; और उस बच्चे के भीतर सबसे पहले कोई सिद्धि नहीं, माँ की कमी है। उसकी साधना किसी संसार-विरक्ति से नहीं, एक छोटे-से हृदय के उस प्रश्न से निकलती है—“माँ जहाँ गई हैं, वहाँ राम रहते हैं तो मैं वहाँ कैसे पहुँचूँ?”
शायद अन्ततः भगवान की करुणा भी यही है—हम जिस ठौर की तलाश में निकलते हैं, ईश्वर कभी-कभी हमें वही ठौर अपने भीतर दे देते हैं। बाहर की सारी यात्राएँ समाप्त हो जाती हैं; भटकना समाप्त होता है; कोई अपना हाथ सिर पर रख देता है; और तब पता चलता है कि जिसे हम जीवन भर ‘राम का पता’ समझकर खोजते रहे, वह वास्तव में अपने होने की जगह थी।
वह बच्चा राम को खोजने निकला था; राम ने उसे ठौर दे दी।
वह माँ तक पहुँचने निकला था; ईश्वर ने उसे ऐसा आश्रय दिया जहाँ उसका वियोग भी प्रेम में बदल गया। और शायद भक्ति का आरम्भ ही वहीं होता है—जहाँ मनुष्य कहता है, “मुझे कहीं पहुँचना नहीं; मुझे बस कहीं ठहरना है।”
माँ से बिछड़ा हुआ बच्चा पहले घर से निकलता है, फिर संसार में भटकता है और अंततः उस सत्ता तक पहुँचता है जिसे उसकी बाल-बुद्धि ने माँ के पते के रूप में सुना था। इस अर्थ में उसकी आध्यात्मिक यात्रा का आरम्भ ‘ईश्वर की खोज’ से नहीं, वियोग की भाषा से होता है। वह दर्शन नहीं जानता, धर्म नहीं जानता, साधना नहीं जानता; वह केवल इतना जानता है कि उसकी माँ कहीं गई हैं और वह उन्हें खोज सकता है। बच्चे के लिए मृत्यु अंतिम बिछोह नहीं बनती—वह एक पता बन जाती है: राम के पास।
यहीं इस कथा की करुणा अपनी सबसे निर्मल अवस्था में पहुँचती है। बड़े लोग मृत्यु को समझाने के लिए जो वाक्य बोल देते हैं, बच्चे कभी-कभी उन्हीं वाक्यों को जीवन का अक्षरशः सत्य मान लेते हैं। “माँ राम के पास चली गई हैं”—वयस्क के लिए सांत्वना का वाक्य था; बच्चे के लिए वह यात्रा का निमंत्रण बन गया। उसे यह नहीं मालूम कि ‘राम के पास’ कोई आध्यात्मिक मुहावरा है। उसके लिए वह सचमुच कोई जगह है। और शायद बालमन की यही अद्भुत पवित्रता है—वह प्रतीक को प्रतीक मानकर नहीं चलता; वह उसमें पूरा संसार बसाकर चल पड़ता है।
फिर पिता का पुनर्विवाह उस बालक के भीतर एक दूसरा विस्थापन पैदा करता है। माँ चली गईं, घर वही है; लेकिन घर अब वही नहीं है। जिस आँगन में माँ की उपस्थिति थी, वहाँ अब अनुपस्थिति है; जिस परिवार में उसकी दुनिया पूरी थी, उसमें एक नया सम्बन्ध आ गया है। बच्चे के पास इन परिवर्तनों को समझने के लिए सामाजिक भाषा नहीं है। वह बस अपने भीतर एक सरल-सा निष्कर्ष बनाता है—जहाँ माँ नहीं, वहाँ मेरा ठौर नहीं। इसलिए उसका घर से निकलना केवल साहसिक यात्रा नहीं, बालमन का मौन निर्वासन है।
और यहीं ‘ठौर’ शब्द पूरी कथा का सबसे सुंदर शब्द बन जाता है। ‘ठौर’ केवल जगह नहीं होती। जगह बाहर होती है; ठौर भीतर बनती है। जगह पर शरीर पहुँचता है; ठौर पर मन टिकता है। घर मिल जाना और ठौर मिल जाना एक बात नहीं। कितने लोग अपने घरों में रहते हुए भी बेठौर होते हैं, और कितने पथिक किसी अपरिचित साधु के चरणों के पास बैठकर पहली बार अनुभव करते हैं कि हाँ, यहाँ मुझे कोई पूछ नहीं रहा कि मैं कौन हूँ; यहाँ मुझे केवल रहने दिया जा रहा है।
इसलिए बालक का भटकना वास्तव में ठौर की खोज है। गाँव से बाहर निकलना, रास्तों से गुजरना, अजनबी चेहरों के बीच जाना—इन सबके नीचे एक ही प्रश्न है: “क्या यही वह जगह है जहाँ राम हैं? और यदि राम यहाँ हैं, तो क्या माँ भी यहीं होंगी?” उसकी यात्रा का भूगोल बदलता रहता है, पर उसकी खोज का केन्द्र नहीं बदलता। वह बाहर राम को ढूँढ रहा है, भीतर उस प्रेम को जो माँ के चले जाने के बाद उससे छूट गया है।
और भारतीय कथा-परंपरा की विलक्षणता यह है कि ऐसी खोज का उत्तर प्रायः किसी पते पर नहीं मिलता। उत्तर किसी व्यक्ति के रूप में आता है। कोई साधु, कोई गुरु, कोई करुणामय मनुष्य, कोई ऐसा स्पर्श जो अनाथ मन को यह भरोसा दे दे कि संसार पूरी तरह खाली नहीं हुआ। तब ‘राम के पास जाना’ धीरे-धीरे भौगोलिक यात्रा से आध्यात्मिक अर्थ में बदल जाता है। बच्चा समझने लगता है कि राम कोई दूर बैठा हुआ देवता मात्र नहीं हैं; राम वह करुणा भी हैं जिसमें भटका हुआ मन अपना भय उतार सकता है।
यहीं फिल्म का शीर्षक भी एक गहरी रोशनी में दिखाई देता है। यदि वह बालक आगे चलकर हनुमान से सम्बद्ध आध्यात्मिक व्यक्तित्व की ओर जाता है, तो यह यात्रा केवल राम की खोज नहीं रहती। भारतीय भक्ति की सबसे सुंदर संरचनाओं में से एक सामने आती है—राम तक पहुँचने के लिए हनुमान की करुणा से होकर गुजरना। बालक ने माँ के बहाने राम को खोजा; जीवन ने उसे ऐसी साधना की ओर पहुँचाया जहाँ सेवा, करुणा, भक्ति और मनुष्य के प्रति प्रेम राम की अनुभूति के माध्यम बनते हैं।
इसमें एक अत्यन्त कोमल inversion है। बच्चा सोचता है कि माँ राम के पास चली गई हैं, इसलिए उसे राम तक जाना है। लेकिन आध्यात्मिक जीवन में आगे चलकर अर्थ उलट जाता है—राम के पास पहुँचने का अर्थ किसी दूरस्थ लोक में जाना नहीं, बल्कि उस करुणा में पहुँचना है जिसमें माँ की स्मृति भी सुरक्षित रह सके।
तब माँ की मृत्यु कथा से गायब नहीं होती। वह उसकी आध्यात्मिकता की पहली मिट्टी बनी रहती है। जिस रिक्तता ने उसे घर से निकाला, वही उसे साधना की ओर ले जाती है। जिस वियोग ने उसे बेचैन किया, वही उसे करुण बनाता है। जिस अकेलेपन ने उसे भटकाया, वही आगे चलकर उसे दूसरों के अकेलेपन को समझने की क्षमता देता है।
इस अर्थ में संत बनने की कथा से पहले यह एक बच्चे के भीतर करुणा के जन्म की कथा है। और शायद यही कारण है कि यह कथा हमें छूती है। क्योंकि हर मनुष्य के भीतर कहीं न कहीं एक ऐसा बच्चा रहता है जिसे जीवन ने कभी न कभी किसी अपने से अलग कर दिया था और जिसने अपने ढंग से किसी ‘राम के पास’ पहुँचने की जगह खोजी थी।
अंततः हनुमान अंश का यह बालक हमें एक बहुत पुरानी भारतीय बात नए ढंग से समझाता है—ईश्वर की खोज हमेशा ईश्वर की इच्छा से शुरू नहीं होती; कभी-कभी वह मनुष्य के वियोग से शुरू होती है। कोई अपने दुःख से निकलता है, कोई अपने प्रश्न से, कोई अपने अपराध-बोध से, कोई अपने अकेलेपन से। इस बालक के लिए वह द्वार माँ थी। माँ चली गईं, लेकिन जाते-जाते उसकी दुनिया में राम का एक पता छोड़ गईं।
और वह बच्चा उस पते को लेकर निकल पड़ा। उसे रास्ते में बहुत कुछ मिला—लोग, जंगल, नदियाँ, मंदिर, साधु, अनुभव। लेकिन अन्ततः उसे जो मिला, वह कोई साधारण ‘मंज़िल’ नहीं थी। उसे ठौर मिली।
यही इस कथा का सबसे मार्मिक रहस्य है—
माँ की चाह ने उसे राम का पता दिया था।बच्चा उस पते को खोजता हुआ निकल पड़ा।उसे राम मिले या नहीं—यह प्रश्न भी शायद छोटा है।बड़ा यह है कि राम के पास पहुँचते-पहुँचतेउस बच्चे को पहली बार लगा—अब मुझे कहीं और नहीं जाना।भटकने की यात्रा वहीं समाप्त होती है जहाँ मन को ठौर मिल जाती है।
और शायद ईश्वर का सबसे मानवीय नाम यही है—ठौर।
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जय श्रीराम
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