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पहचान की चिंगारी

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पहचान की एक चिंगारी

बहुत समय पहले एक विशाल राज्य में एक प्रतापी राजा शासन करता था। उसका एक ही पुत्र था, जो राज्य का भावी उत्तराधिकारी था। लेकिन किशोरावस्था में राजकुमार का व्यवहार बिगड़ गया। वह अनुशासनहीन और उद्दंड हो गया। क्रोध में आकर राजा ने अपने पंद्रह वर्षीय इकलौते पुत्र को राज्य से निष्कासित कर दिया।

राजकुमार अकेला भटकता रहा। उसे न कोई काम आता था और न ही जीवन जीने का कोई अनुभव था। धीरे-धीरे वह एक पड़ोसी राज्य में पहुँच गया और पेट भरने के लिए भीख माँगने लगा। दिन महीने बने, महीने साल बने और देखते ही देखते बीस वर्ष बीत गए।

लगातार भीख माँगते-माँगते वह अपनी असली पहचान ही भूल चुका था। उसके कपड़े फटे हुए थे, बाल बिखरे थे, दाढ़ी बढ़ी हुई थी और शरीर कमजोर हो चुका था। हाथ में एक पुराना कटोरा लिए वह चौराहे पर बैठा राहगीरों से कुछ पाने की उम्मीद करता रहता था।

उधर समय के साथ राजा बूढ़ा हो गया। अब उसे अपने पुत्र की याद सताने लगी। उसने सोचा, “जैसा भी था, आखिर मेरा बेटा ही था। मेरे बाद इस राज्य को कौन संभालेगा?” उसने अपने मंत्रियों को चारों दिशाओं में राजकुमार की खोज के लिए भेज दिया।

एक दिन एक मंत्री का रथ उसी चौराहे से गुज़रा जहाँ वह भिखारी बैठा था। मंत्री की नज़र उस पर पड़ी और अचानक उसे कुछ परिचित-सा महसूस हुआ। उसने रथ रुकवाया और उस भिखारी को अपने पास बुलाया।

सैनिकों ने उसके हाथ की मैल साफ की। जैसे ही कलाई पर बना राजवंश का विशेष चिन्ह दिखाई दिया, मंत्री की आँखें चमक उठीं। वह तुरंत रथ से उतरकर उसके चरणों में झुक गया और ऊँची आवाज़ में बोला, “राजकुमार की जय हो!”

बस, उसी क्षण सब कुछ बदल गया। जो व्यक्ति अभी तक झुकी कमर और बुझी आँखों के साथ खड़ा था, उसकी चाल बदल गई। उसकी कमर सीधी हो गई, आँखों में तेज आ गया और चेहरे पर आत्मविश्वास चमकने लगा। वह अब स्वयं को भिखारी नहीं, एक राजकुमार समझने लगा था।

कटोरा उसके हाथ से कब छूटा, किसी ने नहीं देखा। वह रथ पर चढ़ा और दृढ़ स्वर में बोला, “हमारे स्नान और वस्त्रों की व्यवस्था की जाए।”

लोग आश्चर्य से यह परिवर्तन देख रहे थे। वास्तव में बदला क्या था? केवल उसकी पहचान। परिस्थितियाँ वही थीं, शरीर वही था, लेकिन उसे अपनी असली पहचान याद आ गई थी।

हमारे जीवन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हम भी संसार में छोटी-छोटी खुशियों, प्रशंसा और सुविधाओं की भीख माँगते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि हमारे भीतर असीम शक्ति, आत्मविश्वास और आनंद का खजाना छिपा है।

जिस दिन मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप और सामर्थ्य का बोध हो जाता है, उसी दिन उसके हाथ का “भीख का कटोरा” छूट जाता है और वह अपने जीवन का राजा बन जाता है।

शिक्षा :मनुष्य की सबसे बड़ी गरीबी धन की नहीं, बल्कि अपनी असली पहचान को भूल जाने की है। जिस दिन आत्मविश्वास और आत्मबोध जाग जाता है, उसी दिन जीवन बदल जाता है। जो स्वयं को पहचान लेता है, वही सफलता और आनंद का सच्चा अधिकारी बनता है।

जय श्रीराम

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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