सत्य और मर्यादा की नींव
दंडकारण्य की कुटिया के बाहर जब लक्ष्मण ने चकित होकर पूछा- “भैया, आपने रावण के दूत शुक और सारण को हमारी सेना की सारी गुप्त रणनीतियां देखने दीं और उन्हें जीवित लंका लौटने दिया। क्या युद्ध में शत्रु पर ऐसी दया हमारी दुर्बलता नहीं कहलाएगी?”
श्रीराम ने शांत दृष्टि से देखकर मंद स्वर में कहा – “लक्ष्मण, जो सत्य और मर्यादा की नींव पर खड़ा होता है, उसे अपने बल को छिपाने की आवश्यकता नहीं होती। छल और प्रपंच का आश्रय वह लेता है जिसे अपनी शक्ति पर संदेह हो। जब शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य और निर्भयता को प्रत्यक्ष देख लेता है, तो उसका आधा मनोबल युद्ध से पूर्व ही टूट जाता है। क्षमा और उदारता बलवान का आभूषण दुर्बलता का प्रमाण नहीं।”
यह प्रसंग सिखाता है कि आत्मविश्वास और सत्य के मार्ग पर चलने वाले को किसी आडंबर या कपट की आवश्यकता नहीं होती।
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जय श्रीराम
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