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पीढ़ियां अहसान नहीं मानती

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पीढ़ियां अहसान नहीं मानती

दुबे जी को गए अभी पंद्रह दिन भी पूरे नहीं हुए थे। घर के बाहर एक कबाड़ी खड़ा था। अंदर वही सामान तौला जा रहा था, जिसे दुबे जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी की कमाई और अनगिनत सपनों से जोड़ा था।

वह नक्काशीदार टेबल-कुर्सी, जिसे वे जोधपुर के हस्तशिल्प बाज़ार से बड़े शौक से लाए थे…
वह पुराना हार्मोनियम, जिसकी धुनों में कभी पूरे घर की शामें महकती थीं…
वह नक्काशीदार हुक्का, फूलदान, आलमारी, पलंग… हर चीज़ से उनकी यादें जुड़ी थीं। 
जिसे खरीदते समय उन्होंने कीमत नहीं, अपना दिल लगाया था…आज वही सब सामान कौड़ियों के भाव बिक रहा था।

बेटे-बहू के लिए वह सिर्फ़ “पुराना सामान” था।
उनके लिए उन चीज़ों में कोई याद नहीं थी, कोई अपनापन नहीं था।
वे बस घर को “मॉडर्न” बनाना चाहते थे।

विडंबना देखिए…जिस आलीशान बंगले को बनाने में दुबे जी ने अपनी पूरी जवानी खपा दी, उसी घर में उनकी यादों के लिए दो पल की भी जगह नहीं बची।

यही जीवन का सबसे बड़ा सच है।

हम सारी उम्र यह सोचकर दौड़ते रहते हैं कि आने वाली सात पीढ़ियों के लिए इतना छोड़ जाएँ कि उन्हें कभी किसी चीज़ की कमी न हो। लेकिन अक्सर वही पीढ़ियाँ सबसे पहले हमारी तस्वीर दीवार से उतारती हैं, हमारा सामान कबाड़ी को बेचती हैं और हमारी यादों को “पुराना कबाड़” कहकर भुला देती हैं।

सच तो यह है कि पीढ़ियाँ विरासत संभाल सकती हैं, लेकिन एहसान बहुत कम याद रखती हैं।

इसलिए…अपने आज को मत खोइए।

अपने अपनों के साथ बैठिए, हँसिए, दो मीठे शब्द बोलिए, रिश्तों में समय लगाइए।
धन कमाइए, लेकिन इतना भी नहीं कि जीना ही भूल जाएँ। क्योंकि जब साँसें रुक जाती हैं, तब बैंक बैलेंस नहीं…लोगों के दिलों में छोड़ी हुई मोहब्बत याद रहती है।

ज़िंदगी का सबसे बड़ा निवेश संपत्ति नहीं, अच्छे रिश्ते हैं।

आज में जीना सीखिए… क्योंकि कल किसी ने नहीं देखा।

🙏 जय श्रीराम 🚩

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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