पिता का आशीर्वाद
रामदास रोज़ सुबह अपनी बेटी सीता को स्कूल छोड़ने जाता था। सीता छोटी थी, पर उसके सपने बड़े थे। वह अपने पापा से कहती, “मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनूँगी और सब गरीबों का इलाज करूँगी।”
रामदास गरीब किसान था। कभी बारिश ठीक से होती, कभी नहीं। फसल भी कई बार साथ नहीं देती थी। फिर भी वह सीता की बात सुनकर हँस देता और कहता, “बेटा, तेरे सपने ही मेरी सबसे बड़ी कमाई हैं।”
सीता पढ़ने में बहुत तेज़ थी। उसने दसवीं पास की और आगे पढ़ने के लिए शहर के कॉलेज में दाखिला ले लिया। अब मुश्किल पैसे की थी। फीस, किताबें, हॉस्टल — सब बहुत महँगा था।
रामदास ने हार नहीं मानी। वह कभी खेत में मज़दूरी करता, कभी शहर जाकर काम करता। कई बार उसके जूते फट जाते, तो वह चप्पल पहनकर ही चल देता। दिन भर काम करके थक जाता, फिर भी शाम को घर आकर सीता को देखकर खुश हो जाता।
वह सीता से हमेशा कहता, “पढ़ाई मत छोड़ना बेटा। पापा किसी तरह इंतज़ाम कर लेंगे।”
सीता ने भी जी-जान लगाकर पढ़ाई की। आखिर उसे मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल गया। अब खर्च और बढ़ गया। रामदास ने अपनी थोड़ी-सी ज़मीन का एक हिस्सा बेच दिया।
सीता ने रोकर कहा, “पापा, ये मत कीजिए।”
रामदास ने कहा, “ज़मीन फिर हो जाएगी बेटा, लेकिन तेरा सपना टूट गया तो फिर नहीं जुड़ता।”
कुछ दिन बाद रामदास बहुत बीमार पड़ गया। गाँव के डॉक्टर ने कहा, “इसे अस्पताल ले जाना पड़ेगा।”
यह सुनकर सीता गाँव लौट आई। उसने पापा को बिस्तर पर देखा तो उसकी आँखें भर आईं। वह उनका हाथ पकड़कर बोली, “पापा, मैं डॉक्टर बनने ही वाली हूँ। आप ठीक हो जाइए।”
रामदास ने धीरे से आँखें खोलीं। उसने सीता के सिर पर हाथ फेरा और बहुत धीमे से कहा, “मैं तो पहले से ठीक था बेटा… तेरे सपने पूरे होते देखकर।”
और फिर रामदास हमेशा के लिए चुप हो गया।
रामदास के जाने के बाद गाँव वालों ने मिलकर सीता के कॉलेज का खर्च उठाया। किसी ने फीस दी, किसी ने किताबें दिलाईं, किसी ने हॉस्टल का खर्च संभाला। सबकी मदद से आखिरकार सीता डॉक्टर बन ही गई। डॉक्टर बनने के बाद वह सिर्फ़ गरीब लोगों से इलाज का पैसा नहीं लेती थी। जो भी गरीब उसके पास इलाज के लिए आता, वह उसका पूरा इलाज करती और एक पैसा नहीं लेती थी।
कुछ साल बाद सीता शहर के बड़े अस्पताल में नामी डॉक्टर बन गई। लोग दूर-दूर से उसके पास इलाज कराने आने लगे। वह सबकी बात ध्यान से सुनती और अच्छे से इलाज करती।
लोग उससे पूछते, “डॉक्टर साहब, आप गरीबों से पैसा क्यों नहीं लेतीं?”
सीता बस इतना कहती, “क्योंकि मेरे पापा ने मुझे यही सिखाया था।”
आज भी सीता जब गाँव आती है, तो वह चुप हो जाती है और उसकी आँखें नम हो जाती हैं। उसे अपने पापा की मेहनत और उनका प्यार याद आता है।
जय श्रीराम