गुरु आज्ञा मे अटूट विश्वास
समर्थ रामदास स्वामी के हजारों शिष्य थे, लेकिन उनके मन में अम्बादास (कल्याण स्वामी का पूर्व नाम) के लिए एक विशेष स्थान था। अन्य शिष्यों के मन में अक्सर यह जिज्ञासा रहती थी कि स्वामी जी अम्बादास को इतना प्रेम क्यों करते हैं। इस जिज्ञासा को शांत करने और दुनिया को सच्ची भक्ति का अर्थ समझाने के लिए समर्थ ने एक लीला रची।
एक बार समर्थ रामदास अपने शिष्यों के साथ भ्रमण पर थे। चलते-चलते वे एक प्राचीन और बहुत गहरे कुएँ के पास पहुँचे। उस कुएँ के ठीक ऊपर एक विशाल वृक्ष की एक मोटी टहनी खतरनाक ढंग से झुकी हुई थी। समर्थ वहीं रुक गए और शिष्यों की ओर देखते हुए एक कठिन चुनौती दी। उन्होंने कहा, “क्या तुममें से कोई इस टहनी को काट सकता है? लेकिन शर्त यह है कि इसे बाहर से नहीं, बल्कि अंदर यानी तने की तरफ बैठकर काटना होगा।”
इस शर्त का सीधा अर्थ था कि जो भी टहनी काटेगा, वह टहनी के साथ सीधे उस गहरे और अंधेरे कुएँ में जा गिरेगा। यह साक्षात मृत्यु को निमंत्रण देने जैसा था। समर्थ की बात सुनते ही सभी शिष्य असमंजस में पड़ गए। वे एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे और धीरे-धीरे पीछे हट गए। तर्क और बुद्धि उन्हें रोक रही थी कि ऐसा करना आत्मघाती होगा।
तभी अम्बादास भीड़ से निकलकर शांत भाव से आगे आए। उनके मन में न तो कोई प्रश्न था और न ही मृत्यु का भय। उन्होंने गुरु के चरणों का वंदन किया और कुल्हाड़ी लेकर वृक्ष पर चढ़ गए। वे ठीक उसी जगह बैठ गए जहाँ से टहनी को काटना था। जब उन्होंने पहला प्रहार किया, तो समर्थ ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा, “अम्बादास, रुक जाओ! क्या तुम्हें बोध है कि तुम गिर जाओगे?”
अम्बादास ने कुल्हाड़ी रोकी और बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया, “स्वामी, यदि आज्ञा आपकी है, तो इस पतन में भी मेरा कल्याण ही समाया होगा। गुरु की आज्ञा मेरे प्राणों से बढ़कर है।”
जैसे ही टहनी का अंतिम रेशा कटा, अम्बादास टहनी समेत सीधे कुएँ के ठंडे और गहरे जल में जा गिरे। चारों ओर सन्नाटा छा गया। लेकिन कुएँ के उस अंधेरे तल में एक चमत्कार हुआ; अम्बादास को वहाँ साक्षात प्रभु श्री राम के दर्शन हुए। जब समर्थ के आदेश पर उन्हें बाहर निकाला गया, तो वे पूरी तरह सुरक्षित थे और उनका शरीर किसी दिव्य तेज से चमक रहा था।
समर्थ रामदास स्वामी ने अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें हृदय से लगा लिया। उन्होंने घोषणा की कि आज से अम्बादास का नाम ‘कल्याण’ होगा, क्योंकि उन्होंने गुरु-भक्ति के मार्ग पर चलते हुए स्वयं का और इस जगत का कल्याण सिद्ध कर दिया है। यह प्रसंग आज भी हमें सिखाता है कि जहाँ तर्क समाप्त होता है, वहीं से अटूट श्रद्धा का मार्ग आरंभ होता है।
जय श्रीराम