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परफेक्ट

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परफेक्ट

एक गांव में मोहन नाम का कुम्हार रहता था। वह मेहनती और खुशमिजाज था। हर सुबह वह दो बड़े मटकों में पानी भरकर गांव के लोगों तक पहुंचाता था। एक मटका सुंदर था। लेकिन दूसरा मटका थोड़ा पुराना था। उसके किनारे में छोटी-सी दरार थी। चलते समय उससे थोड़ा पानी टपक जाता था। हर दिन मोहन नदी से पानी भरकर गांव लौटता, तब तक टूटा मटका आधा खाली हो जाता। यह देखकर वह मटका बहुत दुखी रहता

एक दिन उसने उदास होकर मोहन से कहा- मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपके किसी काम का नहीं हूं। मेरे अंदर दरार है, इसलिए मैं पूरा पानी नहीं पहुंचा पाता। दूसरा मटका कितना अच्छा है और मैं कितना बेकार।

मोहन मुस्कराया और बोला- आज घर लौटते समय रास्ते के बाईं तरफ ध्यान से देखना। मटका पूरे रास्ते देखता रहा।

रास्ते के किनारे रंग-बिरंगे फूल खिले हुए थे। तितलियां उड़ रही थीं और रास्ता बहुत सुंदर लग रहा था। लेकिन घर पहुंचते ही मटका फिर दुखी हो हो गया। गया। फिर भी मैं आधा पानी ही ला पाया उसने धीरे से कहा। मोहन हंस पड़ा और बोला क्या तुमने ध्यान दिया ? फूल सिर्फ उसी तरफ खिले हैं, जिस तरफ तुम चलते हो। मुझे दरार के बारे में पहले से पता था। इसलिए मैंने रास्ते में फूलों के बीज बो दिए थे। रोज तुम्हारे टपकते पानी से वे फूल खिल उठे। उन्हीं फूलों से मैं भगवान की पूजा करता हूं और गांव के बच्चों को भी देता हूं।

मटका हैरान रह गया। मोहन ने प्यार से कहा- दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं होता। हर किसी में कमी होती है। कई बार वहीं कमी किसी की सबसे बड़ी खूबी बन जाती है।

मोरल ऑफ द स्टोरी परफेक्ट नहीं होने से दुखी न हों, अच्छे काम से कमियां भी किसी के जीवन में खुशियां ला सकती हैं।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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