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सच्ची ईमानदारी का फल

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सच्ची ईमानदारी का फल

एक छोटे से गांव में मोहन नाम का एक गरीब लड़का रहता था। उसके पिता मजदूरी करते थे और घर की हालत बहुत साधारण थी। मोहन रोज सुबह स्कूल जाता और शाम को अपने पिता की मदद करता

एक दिन स्कूल से लौटते समय उसे रास्ते में एक चमड़े का पर्स मिला। उसने उसे उठाकर देखा तो उसमें काफी पैसे और कुछ जरूरी कागजात थे!

मोहन के मन में एक पल के लिए विचार आया कि इन पैसों से वह अपने घर की कई जरूरतें पूरी कर सकता है। लेकिन अगले ही क्षण उसकी अंतरात्मा ने कहा — “यह तुम्हारा नहीं है।”

वह तुरंत गांव के सरपंच के पास गया और पूरा पर्स उन्हें सौंप दिया। सरपंच ने पर्स खोलकर देखा और बोले, “बेटा, इसमें तो बहुत पैसे हैं, तुम चाहो तो कुछ रख सकते हो।

मोहन ने सिर झुकाकर कहा, “नहीं सरपंच जी, जो मेरा नहीं है उसे रखना गलत है।”

इसी बीच एक बुजुर्ग व्यक्ति घबराए हुए सरपंच के पास पहुंचे। वे अपना खोया हुआ पर्स ढूंढ रहे थे। जब सरपंच ने उन्हें पर्स दिखाया तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

उन्होंने मोहन को गले लगाया और बोले, “बेटा, तुमने मेरी जिंदगी की मेहनत बचा ली।”

बुजुर्ग ने इनाम के रूप में कुछ पैसे देने चाहे, लेकिन मोहन ने विनम्रता से मना कर दिया।

यह बात पूरे गांव में फैल गई। अगले दिन स्कूल में भी मोहन की ईमानदारी की चर्चा हुई। प्रधानाचार्य ने उसे मंच पर बुलाकर सम्मानित किया।

कुछ समय बाद उसी बुजुर्ग व्यक्ति ने मोहन की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का निर्णय लिया।

मोहन ने पूरी मेहनत और लगन से पढ़ाई की और आगे चलकर वह एक बड़ा अधिकारी बन गया। उसने अपने जीवन में हमेशा ईमानदारी को सबसे ऊपर रखा और जरूरतमंद लोगों की मदद करना कभी नहीं छोड़ा।

आज भी लोग उसकी कहानी सुनाकर बच्चों को सच्चाई और ईमानदारी का महत्व समझाते हैं।

शिक्षा 👉मित्रों! ईमानदारी और सच्चाई कभी व्यर्थ नहीं जाती। सही रास्ता शुरुआत में कठिन जरूर लगता है, लेकिन अंत में वही हमें सम्मान, विश्वास और सफलता दिलाता है।

जय श्री राम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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