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जिम्मेवारिया और समस्याएं
एक बार रमेश नाम का एक व्यक्ति बहुत परेशान था। वह अपने घनिष्ट मित्र से सलाह लेने गया।
रमेश ने अपने मित्र से कहा,”ऑफिस में बहुत खींचा तानी का माहौल बना रहता है। घर पर बीवी अपनी लंबी लिस्ट समान की पकड़ा देती है। टेंशन से भरा जीवन , मैं कहाँ जाउँ और क्या करूँ।
मित्र ने सलाह दी कि,”कृष्ण भगवान की पूजा शुरू कर दो।”
रमेश ने कृष्ण भगवान की मूर्ति स्थापित कर पूजा करना शुरू कर दी।कई साल बीत गए लेकिन मन अशांत, ऑफिस और जिम्मेवारियों का बोझ उससे छुटकारा तो अभी तक नहीं मिला था।
फिर रमेश दूसरे मित्र से सलाह लेने गया। उसने कहा कि काली मां की पूजा कर,जरूर तुम्हारे दुख दूर होंगे।
अगले ही दिन वो कालीमां की मुर्ति ले आया।
एक वर्ष तक पूजा करी परंतु मन तो अभी भी अशांत और समस्याएं थी की समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही थी।
अब वो तीसरे मित्र के पास सलाह लेने गया। मित्र ने कहा कि,” जब तक तुम तीन रोग ठीक नहीं करोगे तब तक तुम्हारी समस्याओं का समाधान नहीं मिल सकता।”
वह कौन सी?
चंचल मन, भटकती बुद्धि और पुराने संस्कार।
इसके लिए मुझे करना क्या होगा। रमेश ने पूछा?
मन को शांत करने के लिए जाप करना होगा, मैं शांत स्वरुप आत्मा हूँ। बुद्धि का भटकना बंद हो उसके लिए सुबह और रात को सोने से पहले ध्यान लगाना होगा। संस्कारो के लिए तुम्हे अपने भोजन और नियम को ठीक करना होगा।
“ठीक है मैं कोशिश करूंगा”। ऐसा कहकर रमेश वहां से चला गया।
एक वर्ष के बाद रमेश मित्र का धन्यवाद करने गया। रमेश ने कहा,”अब मुझे ऑफिस में कोई कुछ भी कहे मुझे महसूस नहीं होता। घर की जिम्मेवारियां मुझे बोझ नहीं लगती। अब तो ऐसा लगता है की जैसे *कराने वाला करा रहा है और करनहार हम किये जा रहे।
सार :-
जब तक इंसान यह सोचता है कि मैं कर रहा हूँ तब तक जिम्मेवारिया बोझ लगेंगी और जैसे ही परिस्तिथियों को स्वीकार कर लेता है तो वह वर्तमान का सुख ले सकता है परंतु जाप, ध्यान, भोजन और नियम इसे ठीक करना होगा।
जय जिनेन्द्र
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