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कर्मों का फल

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कर्मों का फल

एक समय की बात है गुरु और शिष्य किसी गांव से गुजर रहे थे थोड़ी दूर चलने पर गुरू जी ने शिष्य से एक कपड़े का टुकड़ा मांगा..!!

आज्ञाकारी शिष्य ने बिना कोई विचार किए अपनी धोती का एक साईड फाड़कर गुरू जी को दे दिया, गुरू जी ने उस टुकड़े को अपने पास रख लियाv थोड़ी दूर चलने पर गांव के बाहर एक खुला मैदान आया पास ही एक पहाड़ी पर बनी सड़क से एक बैलगाड़ी गुजर रही थी एक पत्थर बैलगाड़ी के टकराने से लुढ़कती हुई नीचे आई और गुरु जी के पैरों को लगी और खून बहने लगा !

शिष्य ने गुरू जी को एक पेड़ के नीचे बैठाया घबराते हुए पास के गांव में जाकर एक घर से औषधी मांग कर लाया और गुरु जी के पैरों में औषधी लगाकर पट्टी बांध दी!

कुछ समय बाद गुरू और शिष्य आश्रम पहुंचे वहाँ शिष्य ने गुरू मां को सारा हाल कह सुनाया गुरू जी की पत्नी ने गुरू जी के पैरों को जाकर देखा तो हैरान रह गई  क्योंकि अभी भी गुरु जी के पैरों पर लगी चोट से खून बह रहा था औषधी और पट्टी तो दूसरे पैर पर बंधी थी

गुरू पत्नी ने गुरू जी से पूछा:—कि आपने पहले क्यों नहीं बताया कि पट्टी गलत जगह बांधी जा रही है आप चुप क्यों रहे?

तब गुरू जी ने शिष्य की ओर देखते हुए कहा ये इतना घबराया हुआ था कि इसे ध्यान ही नहीं रहा कि ये पट्टी कहाँ लगा रहा है!

कुछ वक्त बीतने पर शिष्य ने गुरू से पूछा:– हे गुरूदेव ब्रह्मज्ञानी गुरू के तो कोई प्रारब्ध कर्म शेष नहीं होते हैं तो फिर आपको किस कर्म के परिणाम स्वरूप ये चोट लगी?

गुरू जी ने चोट लगने,पट्टी गलत जगह बंधने, खून बहते रहने पर भी कुछ नहीं कहा था, लेकिन जब शिष्य ने सवाल किया तब गुरू जी ने कहा— ये मेरे नहीं तुम्हारे कर्मों के फल हैं

शिष्य– हैरानी से मेरे कर्मों के फल गुरू जी— हाँ, बैलगाड़ी से टकराकर जो चट्टान लुढ़कता हुआ आ रहा था वह तुम्हारे पूर्व के प्रारब्ध कर्मानुसार तुम्हें जीवनभर के लिए अपाहिज बनाने वाला था , शिष्य आश्चर्य से भरा हुआ सुनता जा रहा था !

गुरू जी– तुमने मेरे मांगने पर कपड़े का टुकड़ दे दिया वो मैंने इसलिए मांगा था, पैरों में चोट का लगना,पट्टी का गलत जगह बांधना और घाव से खून का बहते रहना आवश्यक था उससे तुम्हारे कर्म कट गए !

यह सब सुनकर शिष्य बहुत लज्जित हुआ।सिर झुकाकर एक ओर किनारे खड़ा हो गया और क्षमा मांगते हुए कहने लगा

शिष्य–गुरूदेव मुझे क्षमा करें अब मैं ऐसे कोई कर्म नहीं करूंगा जिससे आपको मेरे पाप कर्मों का फल भोगना पड़े..!!

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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