lalittripathi@rediffmail.com
Stories

तभी तो

103Views

तभी तो

एक बार की बात है, एक अति-उत्सुक साधु बाबा विचरण करते हुए एक ऐसे शहर में पहुँचे, जहाँ की प्रजा खुशहाल थी। महाराज का नाम सुनकर साधु को उनसे मिलने की तीव्र इच्छा हुई।

जिस राजा के राज्य में इतना ‘आनंद’ है, उसके चरित्र में कुछ तो खास बात होगी!”—यह सोचकर उन्होंने राजमहल का रुख किया

राजमहल के पहले सुरक्षा घेरे पर, दो सैनिकों ने साधु को रोका। ये सैनिक ऐसे लग रहे थे मानो उनका कवच उनकी छाती से ज़्यादा उनके अहंकार को बचा रहा हो। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी टूटे हुए ढोल को पीटा जा रहा हो।

पहला सैनिक (आँखें तरेर कर): “ओए बुड्ढे! कौन है तू? राजमहल क्या तेरे मामा का घर है जो चला आया? कहीं दुश्मन का जासूस तो नहीं? अपनी गठरी में क्या छिपा रखा है—मिठाई या बम? चल, भाग यहाँ से, वरना तुझे इतनी धूल फाँकनी पड़ेगी कि तुझे अपनी दाढ़ी का रंग याद नहीं रहेगा!”

साधु बाबा ने उनकी अभद्रता, उनकी तुच्छ भाषा और उनकी निम्न सोच को देखा। वह मुस्कुराए और शांत भाव से बोले: “तभी तो।”

सैनिक एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
दूसरा सैनिक (माथा खुजाते हुए): “क्या ‘तभी तो’? क्या मतलब है इसका? तू हमारी बात का जवाब क्यों नहीं देता, गँवार कहीं का!”
साधु ने फिर सिर हिलाया, और वही अटपटा जवाब दिया: “तभी तो।”

सैनिकों को लगा कि साधु पक्का पागल है, या हो सकता है कोई गुप्त कोड बोल रहा हो। डर के मारे उन्होंने साधु को धक्का देकर आगे बढ़ा दिया।

राजमहल के मुख्य द्वार पर, एक चतुर और संकीर्ण सोच वाला द्वारपाल मिला। यह महाशय सैनिकों से ज़्यादा सभ्य थे, पर उनकी आँखों में ‘दक्षिणा का गणित’ चल रहा था।

द्वारपाल (एकदम बनावटी मीठी आवाज़ में): “क्षमा करें, साधु जी। आप अगर दान-पुण्य के लिए आए हैं, तो आज राजा का दक्षिणा देने का दिन नहीं है। अगली पूर्णिमा को राजा ‘दक्षिणा’ देंगे। उस दिन आइएगा, आपको ढेर सारा दान मिलेगा। आज आप जाएँ, राजा जी व्यस्त हैं। यहाँ समय बर्बाद न करें।”

साधु ने देखा कि द्वारपाल का व्यवहार शिष्ट है, पर वह एक अतिथि को केवल ‘फालतू का खर्चा’ मान रहा है।

साधु बाबा (हाथ उठाकर): “तभी तो।”

द्वारपाल तिलमिला गया। उसने गुस्से में कहा: “मैं आपसे पूछ रहा हूँ, तभी तो क्या? क्या आप कहना चाहते हैं कि मैं ग़लत हूँ?”

साधु ने फिर दोहराया: “तभी तो।”

द्वारपाल को लगा कि यह साधु ज़रूर कोई जादूगर है, जिसने उसके गणित को बिगाड़ दिया है। घबराकर वह भागा-भागा मंत्री जी के पास पहुँचा।

मंत्री जी, जो हमेशा ‘नियम-कानून’ की मोटी किताब को बगल में दबाए रखते थे, तुरंत साधु से मिलने आए।

मंत्री जी (औपचारिक स्वर में): “साधु बाबा, सादर प्रणाम। मैं आपकी बात सुनूँगा, पर कृपया संक्षेप में बताएँ। महाराज अभी अपने ‘शाही-दोपहर-भोजन’ करने जा रहे हैं। मैं उनका यह ज़रूरी समय बर्बाद नहीं कर सकता। अपना परिचय और उद्देश्य मुझे बताएँ, मैं सब चीज़ें ‘व्यवस्थित’ कर दूँगा।”

साधु ने मंत्री की कुशलता को सराहा, लेकिन यह भी देखा कि उनके लिए एक जीवित अतिथि से ज़्यादा ज़रूरी ‘समय सारणी’ और ‘व्यवस्था’ थी।

साधु बाबा (धीरे से): “तभी तो।”

मंत्री जी का माथा ठनका। उनका सारा ‘व्यवस्था-ज्ञान’ इन दो-शब्दों के जवाब के आगे ढह गया। व्याकुल होकर, वह सीधे राजा के कक्ष की ओर भागे और उन्हें ‘तभी तो’ के रहस्य के बारे में बताया।

महाराज ने जैसे ही सुना कि एक साधु द्वार पर हैं और उन्हें भोजन से पहले सम्मान नहीं मिला, वह तुरंत खड़े हो गए।

महाराज (आवाज़ में सच्चा प्रेम और क्षमा): “भोजन को ठंडा होने दो! जिस व्यक्ति ने मेरे द्वार पर कदम रखा है, उसका सम्मान मेरे हर नियम से ऊपर है!”

महाराज स्वयं दौड़े-दौड़े गए। उन्होंने साधु के पैर धुलाए, उन्हें अपने से भी ऊंचे आसन पर बिठाया और उनसे पहले भोजन ग्रहण करने की प्रार्थना की।

साधु ने भोजन किया। संतुष्ट होने के बाद, राजा ने हाथ जोड़कर कहा: “महात्मा जी, मेरे सैनिक, द्वारपाल और मंत्री—सब आपके ‘तभी तो’ के रहस्य से परेशान हैं। कृपया मुझे ज्ञान दें।”

साधु ने मुस्कुराते हुए कहा: “तभी तो।”

साधु ने समझाना शुरू किया:

सैनिकों के प्रति “तभी तो”: “उनकी भाषा कठोर, घमंडी और अभद्र थी। उनका व्यवहार ऐसा था, तभी तो वे उस सबसे निचले पद पर हैं, जहाँ उन्हें केवल लट्ठ चलाना आता है, विवेक नहीं।”

द्वारपाल के प्रति “तभी तो”: “उसकी सोच केवल पैसे और व्यापार तक सीमित थी, अतिथि सत्कार की भावना शून्य थी। उसका व्यवहार संकीर्ण था, तभी तो वह द्वार पर ही अटका रहा, महल के अंदर नहीं आ पाया।”

मंत्री के प्रति “तभी तो”: “वह शिष्ट था, पर उसके लिए नियम, एक जीवित अतिथि से ज़्यादा ज़रूरी थे। उसमें व्यवस्था थी, पर हृदय नहीं। उसका व्यवहार कुशल सेवक का था, तभी तो वह मंत्री के पद पर है।”
महाराज के प्रति “तभी तो”: “राजन! आपने भोजन त्यागा, आपने मुझे स्वयं से उच्च आसन दिया, और मेरी सेवा की। आपका व्यवहार विनम्रता, त्याग और प्रेम से भरा है। आपका आचरण सर्वश्रेष्ठ है, तभी तो आप राजा के सर्वोच्च आसन पर हैं।

याद रखें, राजन,” साधु ने निष्कर्ष निकाला, “पद, व्यक्ति के आचरण से परिभाषित होता है, न कि आचरण पद से। हर कोई अपने व्यवहार के दम पर ही अपनी जगह बनाता है।”

जय श्री राम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

Leave a Reply