दिलों की दूरी
गंगा नदी के तट पर एक शांत सुबह थी। हल्की-हल्की हवा बह रही थी, सूर्य की सुनहरी किरणें जल की लहरों पर चमक रही थीं। पक्षियों की मधुर आवाज़ वातावरण को दिव्य बना रही थी। इसी शांत माहौल में एक सन्यासी अपने कई शिष्यों के साथ स्नान करने आया।
सभी ध्यान और साधना के भाव में डूबे थे, तभी अचानक वातावरण में एक कर्कश शोर गूंज उठा। पास ही एक परिवार के कुछ सदस्य, जो अभी कुछ क्षण पहले हँसते-बोलते थे, अचानक किसी छोटी-सी बात पर क्रोधित हो उठे। बात बढ़ने लगी, और फिर वे एक-दूसरे पर जोर-जोर से चिल्लाने लगे। तट का सारा सन्नाटा और शांति जैसे टूट गई।
सन्यासी ने यह दृश्य देखा और ठहर गया। उसने अपने शिष्यों की ओर मुड़कर कहा, “क्या तुम बता सकते हो कि लोग जब क्रोधित होते हैं तो इतना जोर-जोर से क्यों चिल्लाते हैं?” शिष्य कुछ देर सोच में पड़ गए। फिर एक ने सावधानी से उत्तर दिया, “गुरुदेव, शायद इसलिए क्योंकि क्रोध में हमारी शांति खो जाती है।” सन्यासी मुस्कुराया, परंतु उसने पुनः प्रश्न किया, “लेकिन जब सामने व्यक्ति खड़ा है तो उस पर चिल्लाकर क्यों बात की जाए? वह तो बिना चिल्लाए भी सुन सकता है।” इस बार शिष्य एक-दूसरे को देखने लगे। कुछ ने उत्तर देना चाहा, लेकिन कोई भी उत्तर संतोषजनक नहीं था। वे और भी उलझ गए।
सन्यासी ने तट की ओर देखा, कुछ कदम आगे चला, फिर शांत आवाज़ में बोला, “जब दो लोग क्रोधित होते हैं, तो उनके दिल एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं। यह दूरी दिखाई नहीं देती, लेकिन दिलों के बीच एक मानसिक खाई पैदा हो जाती है। वे जितने अधिक क्रोधित होते जाते हैं, दिल उतने ही दूर होते जाते हैं। और जब दिल दूर होते हैं, तो व्यक्ति को लगता है कि सामने वाले को सुनाने के लिए उसे ज़ोर से बोलना पड़ेगा। इसलिए क्रोध में मनुष्य चिल्लाता है।” शिष्य ध्यान से सुन रहे थे। वे प्रत्येक शब्द अपने अंतर में उतार रहे थे।
सन्यासी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “अब सोचो, जब लोग प्रेम में होते हैं, तो क्या वे चिल्लाते हैं? नहीं। वे धीरे-धीरे बोलते हैं, क्योंकि उस समय उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच कोई दूरी नहीं होती। कभी-कभी तो वे बस फुसफुसाकर भी एक-दूसरे की बात समझ लेते हैं। और जब प्रेम अत्यधिक बढ़ जाता है—जब दो हृदय पूर्णतः एक हो जाते हैं—तो तब उन्हें बोलने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। केवल एक-दूसरे को देखकर ही वे सब कह देते हैं। कारण यह कि तब दिलों के बीच की दूरी शून्य हो जाती है।”
शिष्य मौन हो गए। उन्हें यह शिक्षा अत्यंत सुन्दर, सरल और गहरी लगी। वे कुछ समझते हुए एक-दूसरे की ओर देखने लगे जैसे पहली बार उन्होंने दिलों की दूरी का अर्थ समझा हो। इस बीच तट पर चिल्ला रहा परिवार भी धीरे-धीरे शांत हो गया। कुछ देर बाद वे लोग एक-दूसरे से क्षमा मांगते नज़र आए। शायद प्रकृति ने उनके लिए भी कोई संदेश भेज दिया था।
सन्यासी ने जल में कदम रखते हुए कहा, “जीवन में किसी से प्रेम, सम्मान और शांति बनाए रखने का आधार यही है कि दिलों के बीच दूरी न बनने पाए नवनीत। जब भी क्रोध आए, तो यह सोचो कि कहीं यह दूरी बढ़ तो नहीं रही? और यदि दूरी बढ़ने लगे तो तुरंत स्वयं को संभाल लेना चाहिए। क्योंकि चिल्लाने से समस्या हल नहीं होती, केवल दिल और दूर हो जाते हैं।”
शिष्यों ने हाथ जोड़कर गुरु को नमन किया। आज उन्हें क्रोध का सबसे सरल और शानदार सिद्धांत समझ आया था। गंगा का पवित्र जल तट पर लहरें मार रहा था, मानो स्वयं भी कह रहा हो — जहाँ मन शांत, वहीं जीवन सुगंधित।
शिक्षा:-जब दिल करीब होते हैं, आवाज़ धीमी हो जाती है; और जब दिल दूर होते हैं, आवाज़ ऊँची हो जाती है। इसलिए जीवन में क्रोध से पहले दिलों की दूरी को समझो—क्योंकि रिश्तों को बचाने के लिए आवाज़ नहीं, दिल की निकटता चाहिए।
जय श्रीराम