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पिता का त्याग

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पिता का त्याग

दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित और महंगे विद्यालयों में से एक — सेंट जूड थडियस इंटरनेशनल स्कूल — में धूप चमक रही थी। पार्किंग एरिया लग्ज़री कारों से भरा था — मर्सिडीज़ बेंज, बीएमडब्ल्यू और चमचमाती एसयूवी। आज हाई स्कूल बैच 2026 का दीक्षांत समारोह था। सभी अभिभावक महंगे सूट, साड़ियाँ और डिजाइनर शेरवानी पहने हुए थे। हवा में महंगे इत्र की खुशबू थी, और हर किसी के हाथ में अपने बच्चों के लिए फूलों के बड़े-बड़े गुलदस्ते थे।

इसी वैभव के बीच एक बूढ़ा आदमी स्कूल के ऊँचे गेट की दरार से अंदर झाँकने की कोशिश कर रहा था। उसका नाम था रामकिशन। उसने फीकी पड़ी नीली कमीज़ पहन रखी थी, जिस पर चाशनी के दाग लगे थे। उसकी पैंट पुरानी और घिसी हुई थी। पैरों में जूते नहीं, सिर्फ टूटी-फूटी चप्पलें थीं। उसके बगल में उसकी लकड़ी की टोकरी थी, जिसमें वह रोज़ गरम जलेबी और चना बेचता था।

अरे ओ बाबा! कितनी बार कहा है यहाँ से हट जाओ!” सिक्योरिटी गार्ड ओमप्रकाश ने डंडा हाथ में लेते हुए चिल्लाकर कहा। “मेहमानों के रास्ते में खड़े हो! और कैसी बदबू आ रही है तुमसे!”

तभी स्कूल की सख्त और अभिमानी प्रधानाचार्या दीपा अरोड़ा वहाँ आईं। उन्होंने नाक सिकोड़ते हुए कहा,
“गार्ड, अभी तक इसे भगाया क्यों नहीं? देखो इसकी हालत! बोर्ड मेंबर्स क्या सोचेंगे? यह एक एक्सक्लूसिव इवेंट है!”

रामकिशन ने काँपती आवाज़ में कहा, माफ़ कीजिए मैडम… मैं बस अपने बेटे को देखना चाहता हूँ। आज उसका ग्रेजुएशन है। वह वैलिडिक्टोरियन है।”

दीपा अरोड़ा ज़ोर से हँस पड़ीं।
“वैलिडिक्टोरियन? एक फेरीवाले का बेटा? क्या मज़ाक है! यहाँ पढ़ने वाले बच्चे प्रतिष्ठित परिवारों से आते हैं। यहाँ कोई झुग्गी-झोपड़ी वाला नहीं पढ़ता। अभी चले जाओ, नहीं तो पुलिस बुला लूँगी!”

रामकिशन की आँखों में आँसू आ गए। वह अपमान सहने का आदी था। उसने धीरे से अपनी टोकरी उठाई।
“ठीक है मैडम… मैं दूर खड़ा हो जाता हूँ। बस एक झलक देख लूँगा।”

“नहीं! मैंने कहा यहाँ से पूरी तरह निकल जाओ! मेरे स्कूल की सीमा में तुम्हारा चेहरा भी नहीं दिखना चाहिए!” प्रधानाचार्या चिल्लाईं और एयर-कंडीशन्ड ऑडिटोरियम में चली गईं।

समारोह शुरू हुआ। मंच सुनहरे और नीले रंग की सजावट से सजा था। एक-एक कर मेधावी छात्रों को बुलाया गया। जब नाम पुकारा गया —
“आदित्य शर्मा, वैलिडिक्टोरियन!”
तो पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।

आदित्य लंबा, आत्मविश्वासी और तेजस्वी दिख रहा था। प्रधानाचार्या ने मुस्कुराते हुए उसे मेडल पहनाया।
बधाई हो बेटा। तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है। तुम्हारे माता-पिता बहुत गर्व महसूस कर रहे होंगे। वे कहाँ हैं?” उन्होंने माइक थमाते हुए पूछा

आदित्य ने माइक लिया। उसने भीड़ में नज़र दौड़ाई — सजे-धजे अमीर माता-पिता, सहपाठी… लेकिन उसके पिता कहीं नहीं थे। वह जानता था, उन्हें अंदर आने नहीं दिया गया होगा।

उसने बोलना शुरू किया,
“Good morning to our distinguished guests, teachers, parents and fellow graduates…”

उसकी अंग्रेज़ी धाराप्रवाह और प्रभावशाली थी। पर बीच में वह रुक गया। जिमनैज़ियम की बड़ी खिड़की से उसे गेट के बाहर धूप में खड़ा एक परिचित चेहरा दिखाई दिया — हाथ में टोकरी लिए।

“मैंने सफलता और महत्वाकांक्षा पर भाषण तैयार किया था,” उसकी आवाज़ भावुक हो गई, “लेकिन असली सफलता मेडल, अंक या पैसे में नहीं होती। असली सफलता त्याग में होती है।”

हॉल में खामोशी छा गई। प्रधानाचार्या ने घबराकर शिक्षकों की ओर देखा।

“अभी थोड़ी देर पहले मैंने देखा, एक बुज़ुर्ग को गेट से भगा दिया गया। उन्हें गंदा कहा गया। उनका मज़ाक उड़ाया गया क्योंकि वे सिर्फ एक फेरीवाले हैं।”

आदित्य ने सीधा दीपा अरोड़ा की ओर देखा। उनकी आँखें फैल गईं।

“वह बुज़ुर्ग,” उसने खिड़की की ओर इशारा किया, “हर सुबह तीन बजे उठते हैं। मेरे लिए खाना बनाते हैं। दस किलोमीटर पैदल चलते हैं, धूप हो या बारिश, सिर्फ इसलिए कि मैं पढ़ सकूँ। उन्होंने अपने लिए नए कपड़े नहीं खरीदे, क्योंकि पैसे मेरी किताबों पर खर्च किए। कई रातें भूखे सोए, ताकि मैं पेट भर खा सकूँ।”

यह कहकर आदित्य मंच से नीचे उतर गया। लोग फुसफुसाने लगे,
“वह कहाँ जा रहा है?”

स्पॉटलाइट और कैमरे उसके पीछे-पीछे चले। उसने बड़ा दरवाज़ा खोला और गेट की ओर दौड़ा।

वहाँ रामकिशन सिर झुकाए, आँसू पोंछते हुए जाने ही वाले थे।

“पिताजी!” आदित्य ने पुकारा।रामकिशन मुड़े।
“बेटा? आदित्य? तुम बाहर क्यों आए? तुम्हारा भाषण…?”आदित्य ने उन्हें कसकर गले लगा लिया।
“आपके बिना मैं इस मंच पर नहीं खड़ा हो सकता।”

वह अपने पिता का हाथ पकड़कर अंदर ले गया। गार्ड ने रोकने की कोशिश की, लेकिन आदित्य ने सख्त आवाज़ में कहा,
“अगर मेरे पिता को रोका, तो मैं अपने सारे पुरस्कार लौटा दूँगा।”

दोनों हाथ पकड़कर ऑडिटोरियम में दाखिल हुए — वैलिडिक्टोरियन और एक साधारण फेरीवाला।

पूरा हॉल खामोश था। चप्पलों की आवाज़ चमकते फर्श पर गूँज रही थी।

मंच पर पहुँचकर आदित्य ने अपना स्वर्ण पदक उतारकर अपने पिता के गले में डाल दिया। अपनी ग्रेजुएशन गाउन उनके कंधों पर रख दी।

“Ladies and gentlemen,” उसने माइक्रोफोन पर कहा,
“मैं आपको अपनी ज़िंदगी के असली वैलिडिक्टोरियन से मिलवाता हूँ — मेरे पिता, रामकिशन। आपने इनके कपड़ों पर गंदगी देखी होगी। यह मेहनत की गंदगी है। यह उन लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा साफ है, जो कपड़ों से इंसान की इज़्ज़त मापते हैं।”

दीपा अरोड़ा शर्म से कुर्सी में झुक गईं।

कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर एक अभिभावक खड़ा हुआ और ताली बजाई। धीरे-धीरे पूरा हॉल खड़ा हो गया। स्टैंडिंग ओवेशन गूँज उठा। कई लोगों की आँखें नम थीं।

रामकिशन रो पड़े — अपमान से नहीं, गर्व से।

समारोह के बाद कई लोग उनसे हाथ मिलाने आए। स्कूल बोर्ड ने सार्वजनिक रूप से माफी माँगी। अगले ही दिन सोशल मीडिया पर विवाद बढ़ने के बाद दीपा अरोड़ा ने इस्तीफा दे दिया।

आदित्य को देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में छात्रवृत्ति मिली। वह आगे चलकर एक सफल इंजीनियर बना। लेकिन उसने कभी नहीं भुलाया — उसकी सफलता की नींव एक साधारण फेरीवाले पिता के त्याग पर टिकी थी।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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