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नेकी का हिसाब सच में चुकता होता है

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नेकी का हिसाब सच में चुकता होता है

मुंबई—सपनों का शहर। एक ऐसा शहर जहाँ लाखों लोग अपनी आँखों में हज़ारों उम्मीदें लिए हर रोज़ ट्रेन और बसों की भीड़ में अपनी किस्मत आज़माते हैं। यहाँ की रफ़्तार कभी नहीं रुकती, और इसी भागदौड़ में अक्सर लोग इंसानियत को पीछे छोड़ देते हैं। लेकिन कभी-कभी एक छोटी सी नेकी आपकी पूरी जिंदगी बदल सकती है। यह कहानी मनोहर की है, एक ऐसे साधारण नौजवान की जिसने अनजाने में अपने भविष्य की सबसे मज़बूत नींव एक बस की सीट देकर रखी थी।

संघर्ष की गलियाँ और सुनहरे सपने मनोहर को मुंबई आए तीन साल बीत चुके थे। वह उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से यहाँ अपने परिवार की किस्मत बदलने आया था। उसके पिता एक साधारण किसान थे और माँ घर संभालती थी। पूरे परिवार ने पेट काटकर उसे पढ़ाया-लिखा था, और अब पूरे गाँव की नज़रें मनोहर की कामयाबी पर टिकी थीं।

वह धारावी के पास एक छोटे से सीलन भरे कमरे में रहता था। कमरा इतना छोटा था कि वहाँ बमुश्किल एक चारपाई और एक कोने में खाना बनाने का चूल्हा समा पाता था। दीवारों पर जमी नमी और टपकती छत उसके संघर्ष की गवाही देती थी। मनोहर की जेब में हमेशा अखबार की कटिंग्स होती थीं—नौकरियों के विज्ञापन, इंटरव्यू के पते। उसके जूते घिस चुके थे और शर्ट की कॉलर पुरानी पड़ गई थी, लेकिन उसकी आँखों की चमक अभी धुंधली नहीं हुई थी।

हर सुबह वह चाय बनाता, अखबार में नई उम्मीदें तलाशता और फिर अंधेरी, बांद्रा या नरिमन पॉइंट की ओर निकल पड़ता। दिन भर इंटरव्यू देना और शाम को खाली हाथ घर लौटना उसकी नियति बन चुकी थी।

जुलाई की वह उमस भरी दोपहर जुलाई का महीना था। मुंबई की मशहूर बारिश के बीच आज धूप खिली हुई थी, जिससे उमस और गर्मी असहनीय हो गई थी। मनोहर बांद्रा की एक कंपनी से इंटरव्यू देकर लौट रहा था। आज का इंटरव्यू भी उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा था। मन भारी था और थकान चरम पर थी।

उसने अपनी जेब टटोली, बमुश्किल बस का किराया बचा था। वह बीईएसटी (BEST) की उस लाल रंग की डबल-डेकर बस में चढ़ा। बस खचाखच भरी हुई थी। पसीने की बदबू, डीजल का धुआँ और लोगों का शोर—माहौल बहुत बोझिल था। तभी मनोहर की खुशकिस्मती से उसे बीच में एक सीट मिल गई। वह राहत की साँस लेकर बैठ गया और अपने पुराने फोन पर नए जॉब अपडेट्स चेक करने लगा।

बस अगले स्टॉप पर रुकी और वहाँ से एक महिला चढ़ी। उसकी उम्र लगभग 30-35 साल रही होगी। वह सुशिक्षित और सभ्य दिख रही थी, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात उसकी गर्भावस्था थी। वह स्पष्ट रूप से सात महीने की गर्भवती थी।

मनोहर ने देखा कि महिला बस की भीड़ में इधर-उधर नज़रें दौड़ा रही थी, शायद किसी खाली सीट की उम्मीद में। लेकिन उसके आसपास बैठे युवा अपने फोन में व्यस्त थे—कोई गाने सुन रहा था, कोई सोशल मीडिया स्क्रोल कर रहा था। किसी ने भी उस महिला की तकलीफ की ओर ध्यान नहीं दिया। बस के झटकों से महिला का संतुलन बिगड़ रहा था और वह कसकर एक रॉड पकड़े खड़ी थी।

अंतरात्मा की पुकार मनोहर के मन में द्वंद्व चल रहा था। वह खुद भी बहुत थका हुआ था, उसके पैर दर्द कर रहे थे और उसे अभी दादर से धारावी तक लंबा सफ़र करना था। लेकिन तभी उसे अपनी माँ की एक बात याद आई। माँ ने बताया था कि जब वह गर्भवती थीं, तब एक बार बस में उन्हें बहुत तकलीफ हुई थी क्योंकि किसी ने उन्हें बैठने की जगह नहीं दी थी।

“नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूँगा,” मनोहर ने मन ही मन निश्चय किया। उसने अपनी थकान को किनारे रखा, अपना बैग उठाया और खड़ा हो गया।

वह महिला के पास गया और विनम्रता से कहा, “एक्सक्यूज़ मी, आप प्लीज़ मेरी सीट पर बैठ जाइए। आप इस हालत में खड़े-खड़े सफ़र नहीं कर सकतीं।”

महिला हैरान रह गई। इस स्वार्थी दौर में जहाँ लोग सीट के लिए लड़ते हैं, वहाँ एक अजनबी का अपनी सीट छोड़ देना उसे अचंभित कर गया। उसने मना किया, “नहीं-नहीं, आप बैठिए, मैं ठीक हूँ।”

मनोहर मुस्कुराया और झूठ बोला, “प्लीज़ बैठ जाइए। मुझे वैसे भी अगले स्टॉप पर ही उतरना है।”

महिला ने आभार के साथ सीट ले ली। मनोहर रॉड पकड़कर खड़ा हो गया। सफ़र के दौरान महिला ने बातचीत शुरू की। मनोहर ने अपनी सादगी और ईमानदारी से बताया कि वह यहाँ नौकरी की तलाश में है और उत्तर प्रदेश के एक गाँव से आया है। महिला ने सहानुभूति से उसकी बातें सुनीं और उसे हौसला दिया, “मेहनत कभी बेकार नहीं जाती, आपको ज़रूर अच्छी नौकरी मिलेगी।”

स्टॉप आने पर महिला ने मनोहर को दुआएँ दीं और उतर गई। मनोहर ने खाली सीट पर बैठते हुए सोचा कि आज किसी की मदद करके उसे एक अलग ही सुकून मिला है।

चार साल बाद: किस्मत का दरवाजा
वक्त गुज़रता गया। अगले चार सालों में मनोहर ने कई छोटी-मोटी नौकरियाँ कीं, लेकिन कोई भी स्थायी नहीं थी। अब वह 28 साल का हो चुका था। घर से दबाव बढ़ रहा था, माता-पिता बीमार रहने लगे थे और छोटी बहन की शादी की चिंता उसे खाए जा रही थी।

एक सुबह अखबार के ‘रोज़गार’ कॉलम में उसे एक बड़ी मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में ‘अकाउंट्स मैनेजर’ की पोजीशन दिखी। यह उसके लिए सपनों की नौकरी जैसी थी। मनोहर ने हिम्मत जुटाई, अपनी सबसे अच्छी शर्ट पहनी और अंधेरी स्थित उस शानदार ऑफिस में इंटरव्यू के लिए पहुँच गया।

वहाँ का वेटिंग एरिया उम्मीदवारों से भरा था। मनोहर का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। जब रिसेप्शनिस्ट ने उसका नाम पुकारा, तो वह गहरी साँस लेकर तीसरी मंज़िल पर सीईओ के ऑफिस की तरफ बढ़ा।

जैसे ही मनोहर केबिन के अंदर दाखिल हुआ, उसकी साँसें थम गईं।
प्रिया मल्होत्रा—कंपनी की सीईओ। उन्होंने मनोहर को देखते ही पहचान लिया। मनोहर तो उन हज़ारों चेहरों को भूल चुका था, लेकिन प्रिया ने उस ‘नेक इंसान’ को नहीं भुलाया था। प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “बैठिए मनोहर।”

मनोहर हैरान था कि मैडम ने उसे नाम से कैसे पुकारा। उसने अपनी फाइल आगे बढ़ाई। प्रिया ने फाइल ली और बिना खोले एक तरफ रख दी। मनोहर घबरा गया, “मैडम, क्या कुछ गलत है?”

प्रिया की मुस्कुराहट और चौड़ी हो गई। “मनोहर, आप कल से जॉइन कर सकते हैं। यह पोजीशन आपकी है।”जब मनोहर ने हकलाते हुए पूछा कि बिना इंटरव्यू के यह फैसला कैसे हुआ, तब प्रिया ने उसे चार साल पहले की वह दोपहर याद दिलाई। उन्होंने कहा, “उस दिन आपने सिर्फ मुझे सीट नहीं दी थी, बल्कि आपने इंसानियत का परिचय दिया था। मुझे आपके डॉक्यूमेंट्स देखने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के एक अजनबी की मदद कर सकता है, वह मेरी कंपनी के लिए सबसे बड़ा एसेट होगा।”

मनोहर की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। चार साल का संघर्ष, हज़ारों रिजेक्शन और वो सारी रातें जब वह भूखे पेट सोया था—सब कुछ एक पल में सार्थक हो गया।

अगले दिन से मनोहर ने पूरी निष्ठा के साथ काम शुरू किया। जल्द ही उसकी सैलरी बढ़ गई, उसने एक अच्छा घर लिया, बहन की धूमधाम से शादी की और अपने माता-पिता का इलाज कराया। प्रिया मल्होत्रा अक्सर अपने चार साल के बेटे को ऑफिस लातीं और मनोहर से कहतीं, “बेटा, ये वो अंकल हैं जिन्होंने तुम्हारी माँ की तब मदद की थी जब दुनिया सो रही थी।”

कहानी से सीख -मनोहर की यह कहानी हमें कई महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाती है:

नेकी कभी बेकार नहीं जाती:

भले ही फल तुरंत न मिले, लेकिन अच्छे कर्म हमेशा सही समय पर लौटकर आते हैं।
स्वार्थ रहित मदद:

मनोहर ने बिना यह सोचे मदद की कि वह महिला कौन है। उसने बस अपनी अंतरात्मा की सुनी।
मानवता सबसे बड़ा धर्म है:

आज के डिजिटल युग में जहाँ लोग फोन में खोए रहते हैं, वहाँ दूसरों की तकलीफ को महसूस करना ही असली इंसानियत है।
मुंबई की उस बस की एक छोटी सी सीट मनोहर के जीवन का सबसे बड़ा निवेश बन गई। याद रखिये, जब आप दूसरों के लिए रास्ता बनाते हैं, तो कुदरत आपके लिए मंज़िल के दरवाज़े खोल देती है।

उपसंहार: अगली बार जब आप किसी सार्वजनिक स्थान पर हों और किसी ज़रूरतमंद को देखें, तो एक पल के लिए रुकिए। आपकी एक छोटी सी मदद किसी की जिंदगी बदल सकती है, और शायद हमारी भी।

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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