सम्मान किस में है
एक राजा ने किसी कारण से अपनी सेना के एक सेनापति से रुष्ट होकर उसे पदच्युत करके सूबेदार बना दिया। समय बीतने पर उसे सूबेदार को राजा के सम्मुख उपस्थित होना पड़ा।
राजा ने पूछा- मैं तुम को पहले के समान प्रसन्न देखता हूँ, क्या बात है ?
सूबेदार बोला- श्रीमान ! मैं तो पहले की अपेक्षा भी सुखी हूँ। पहले तो सैनिक और सेना के छोटे अधिकारी मुझसे डरते थे, मुझसे मिलने में संकोच करते थे; किंतु अब वे मुझसे स्नेह करते हैं। मेरा भरपूर सम्मान करते हैं। प्रत्येक बात में मुझसे सम्मति लेते हैं। उनकी सेवा करने का अवसर तो मुझे अब मिला है। सिकन्दर ने फिर पूछा- पदच्युत होने में तुम्हें अपमान नहीं प्रतीत होता ?
सूबेदार ने कहा-सम्मान पद में है या मानवता में ? उच्चपद पाकर कोई प्रमाद करे, दूसरों को सतावे, घूस आदि ले और गर्व में चूर बने तो वह निन्दा के योग्य ही है। वह तो बहुत तुच्छ है। सम्मान तो है दूसरों की सेवा करने में, कर्तव्यनिष्ठ रहकर सबसे नम्र व्यवहार करने में और ईमानदारी में। भले वह व्यक्ति सैनिक हो या उससे भी छोटा गाँव का चौकीदार।_
राजा ने कहा- तुम मेरी भूल पर ध्यान मत देना। तुम्हें फिर से सेनापति बना दिया है ।
जय श्रीराम