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परम भक्त नरसी जी की कथा

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परम भक्त नरसी जी की कथा

आज से लगभग 500-600 वर्ष पहले की बात है। एक नरसी नाम के श्रीकृष्ण जी के परम भक्त थे। परंतु थे बहुत ही कंजूस और 56 करोड़ की संपत्ति के मालिक थे। परमात्मा कहते हैं माया को सिर पर नहीं रखना चाहिए जैसे मोटरसाइकिल को सिर पर नहीं रखते, उसको तो चलाते हैं परंतु सेठ नरसी मेहता माया से चिपक कर बैठे हुए थे अर्थात दान नहीं करते थे बल्कि बहुत कंजूस थे। उनकी केवल एक लड़की थी और उसकी भी शादी नरसी ने कर दी थी। साथ ही, नरसी जी के नाम की हुण्डी चला करती थी जैसे आज बैंकों द्वारा ड्राफ्ट बनाए जाते हैं। पैसे जमा करके एक कागज में बैंक ड्राफ्ट बनाते हैं कि हमारे पास इसके इतने रुपए जमा हो चुके हैं और उस ड्राफ्ट को आप किसी दूसरे शहर में जाकर बैंक में दे दो उतने ही पैसे मिल जाया करते हैं, ऐसे ही पहले के समय में हुंडी काम करती थी।

इसके लिए राजाओं द्वारा धनी व्यक्तियों की संपत्ति के हिसाब से उन्हें हुंडी बनाने की मान्यता प्रदान की जाती थी कि कोई व्यक्ति इतने रुपये तक की हुंडी (ड्राफ्ट) बना सकता है। सेठ लोग फिर आपस में महीने, 6 महीने, एक वर्ष में एक दूसरे से कागज और धन आदान-प्रदान कर लिया करते थे। वहीं नरसी जी के पास 56 करोड़ की संपत्ति थी यदि आज के समय से अनुमान लगाएं तो अरबों खरबों की संपत्ति थी और धन इकट्ठा करने के चक्कर में वह इतना कंजूस हो गये थे कि वह चवन्नी भी दान नहीं करते थे। लेकिन परमात्मा तो परमात्मा ही होता है उन्होंने उस प्यारी आत्मा से माया का वह जाल छुड़वाया जोकि उसके जी का जंजाल बना हुआ था।

एक दिन सेठ नरसी की पत्नी ने कहा कि हमें आप गंगा स्नान करवा कर लाइए। लेकिन नरसी सेठ कहने लगा क्यों पैसे बर्बाद करती हो यहीं नहा लो, क्या रखा है वहां? इतनी दूर जाओगी, नरसी ने सोचा अगर यह वहां जाएगी तो 10-20 रूपए खर्च होंगे। जब नरसी की पत्नी ने नरसी से ज्यादा कहा तो नरसी जी ने सोचा अब यह मुझे ज्यादा दु:खी करेगी, सिर में दर्द रखेगी, ऐसा सोचकर वह पत्नी के कहने से गंगा स्नान के लिए चल पड़ा।

जब वे गंगा में जाकर स्नान करने लगे इतने में ही पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी ने वहां साधु रूप में प्रकट होकर उन्हें श्रीकृष्ण की महिमा सुनाई। क्योंकि नरसी और उसकी पत्नी कृष्ण जी के पुजारी थे। आप इस लेख को पढ़ते रहिए, धीरे-धीरे आप को प्रमाणों से समझ में आ जाएगा कि परमात्मा ने उनके सामने श्रीकृष्ण जी की महिमा क्यों गाई थी?

कबीर साहेब ब्राह्मण रूप बनाकर आए और कहने लगे सेठ नरसी जी गंगा स्नान करने आए हो तो कुछ दान करो, क्योंकि जैसी परंपरा बना रखी थी उसी को आधार बनाकर परमात्मा ब्राह्मण रूप में बोले। नरसी सेठ बोला मेरे पास पैसे थोड़े ही हैं आप जाओ किसी और से ले लो। परमात्मा कहने लगे सेठ जी वैसे ही नहाने से क्या फायदा कुछ दान किया करो। नरसी की पत्नी कहने लगी “दे दो ना 1, 2 रुपए दान ब्राह्मण को।” नरसी ने अपनी पत्नी से कहा, “नहा ले चुप करके यहां तक ले आया यह कम थोड़े है, यही बड़ी बात समझ तू, पैसे दान कर दे, पैसे कहां से आते हैं, मैं यहां ज़्यादा पैसे थोड़ी लेकर आया था।” अंत में भगवान ने कहा “आठ आने दे दे।” नरसी बोला मेरे पास आठ आने भी नहीं हैं। भगवान ने बोला चार आने का तो कर दो दान, वह कहने लगा मेरे पास चार आने भी नहीं हैं, नरसी कहने लगा एक टका दूंगा, सिर्फ एक टका, परमात्मा ने कहा चल एक टका ही दे दो। नरसी बोला एक टका तो दे दूंगा लेकिन मेरे घर आना पड़ेगा यहाँ मैं थोड़ा लाया हूँ। भगवान बोले चलो घर पर दे देना…

जब सेठ नरसी जी गंगा से स्नान करके अपने घर पहुंचे तो पीछे से ब्राह्मण वेशधारी कृष्ण जी ने जाकर सेठ जी के द्वार खटखटा दिए, दरवाजे पर नौकर आये, नौकरों ने पूछा क्या बात है ब्राह्मण जी? ब्राह्मण वेश में भगवान बोले, आपके सेठ ने मुझे एक टका दान किया है और उसने मुझे घर आकर लेने के लिए कहा था। नौकर ने जाकर सेठ जी से बताया कि सेठ जी एक ब्राह्मण आया है और कह रहा है कि आपने गंगा पर उन्हें एक टका दान देने के लिए कहा था वही लेने आया है। अब नरसी ने सोचा यह तो बड़ा ही ढीठ है मेरे पीछे-पीछे आ गया। सेठ नरसी ने नौकर से कहा कि ब्राह्मण से जाकर बोल दो, आज सेठ जी थकेहारे हैं कल देंगे। नौकर ने आकर ब्राह्मण को संदेश सुना दिया। ब्राह्मण वेशधारी परमात्मा बोले कोई बात ना, आज विश्राम कर लेता हूं। कल लेकर ही यहां से जाऊंगा।

नरसी जी के मकान के बाहर एक हरा भरा बाग था, उसी बाग में ब्राह्मण रूप में परमात्मा चादर बिछा कर लेट गए। सुबह उठते ही परमात्मा ने फिर सेठ जी का दरवाजा खटखटा दिया और ब्राह्मण रूपी भगवान ने नौकरों से कहा कि सेठ जी से कहो कि वह मेरा एक टका दे दे। नौकर ने अंदर जाकर सेठ नरसी को बताया कि, “वह ब्राह्मण द्वार पर खड़ा है अपना एक टका मांग रहा है।सेठ ने सोचा बड़ा ढीठ है यह तो गया ही नहीं।

अब नरसी जी ने सोचा आज यह एक टके की ज़िद्द लगा रहा है, कल हो सकता है कि यह 100 रूपए की ज़िद्द लगा कर बैठ जाए, इसको तो मौका मिल गया। इसका काम कर देता हूं नहीं तो आगे फिर दु:खी करेगा। नौकर से नरसी सेठ ने कहा ब्राह्मण से कह दो कि हमारे सेठ जी सफर से आए थे इसलिए बुखार हो गया है और जब ठीक हो जाएंगे तब आपका एक टका दे देंगे। ब्राह्मण ने कहा बार-बार तो आया नहीं जाता, कोई बात ना एक-दो दिन और इंतजार कर लेते हैं अब पैसे लेकर ही जाऊंगा। भगवान दिन में घूम फिर आए और शाम को आकर सेठ जी के बाग में लेट गए। नरसी जी ने 1 दिन देखा, 2 दिन देखा 3 दिन देखा, फिर नौकरों से पूछा कि वह गया कि यहीं पर है? नौकर कहने लगे कि वह तो यहीं सामने बाग में बिस्तर लगाए बैठा है और कह रहा था कि बार बार तो आया नहीं जाता, अब लेकर ही जाऊंगा।

अब नरसी सेठ जी ने सोचकर कहा कि ब्राह्मण से कह दो कि सेठ जी बीमार थे उनकी मौत हो गई। नौकरों ने जाकर ब्राह्मण रूपी भगवान को बताया कि हमारे सेठ जी बीमार थे जिस कारण उनकी मृत्यु हो गई। ब्राह्मण रूप में आए परमात्मा ने कहा यह तो बड़े दु:ख की बात है। सेठ जी बेचारे गंगा स्नान करके आए थे। फिर भगवान बोले कोई बात नही, यहां तो मरना जीना लगा रहता है, मृत्यु तो हो ही गई है तो अब मैं सेठ जी का अंतिम संस्कार करा कर ही जाऊंगा। नौकर ने नरसी सेठ से आकर बताया कि ब्राह्मण तो बोल रहा है कि मैं अंतिम संस्कार करा कर ही जाऊँगा। नरसी जी ने कहा कि तुम लकड़ी ढोना शुरू कर दो, शायद उसके समझ में आ जाए कि वास्तव में मैं मर गया हूँ , तो नौकरों ने लकड़ियां ढोना शुरू कर दिया। विचार करने वाली बात है कि यदि शहर नगर का इतना बड़ा धनी सेठ मर जाए तो पूरा शहर इकट्ठा हो जाया करता है। लेकिन सेठ जी ने अपनी अल्पबुद्धि से परमात्मा जो पल पल की जानने वाला है उसे भगाने के लिए यह तरकीब लगाई।

वहां पर वह चार नौकर लकड़ी ढो रहे हैं। जब नौकरों ने लकड़ी ढो लीं तो नरसी जी ने पूछा कि वह गया या नहीं, नौकरों ने बताया वह भी एक लकड़ी हाथ में उठाए हुए है और श्मशान घाट की तरफ जाने को तैयार है। अब नरसी जी कहने लगे तुम मेरी नकली अर्थी तैयार करो। उसमें सेठ जी लेट गए और अर्थी को लेकर चारों नौकर चल पड़े। सेठ नरसी जी ने नौकरों से बोला कि तुम लोग आग मत लगाना। सेठ जी को नौकरों ने चिता के ऊपर रख दिया तब भगवान ने कंधे पर उठाई हुई लकड़ी को नीचे डाल दिया और सेठ जी से कहा कि आप तो एक टके पर जान देने जा रहे हो।

ब्राह्मण रूप में भगवान ने कहा, सेठ जी मैंने माफ कर दिया एक टका, आपका दान अब हम नहीं लेंगे और भगवान वहां से चले गए। तब नरसी सेठ ने नौकरों से सारी लकड़ियां उठवांईं। वह माया के चक्कर में इतना कंजूस हो गए थे कि बची हुई छोटी मोटी लकड़ियों को भी अपनी धोती के कपड़े में डालकर वापस घर ले आए।

अगले दिन नरसी जी ने सोचा कि ब्राह्मण तो चला गया। आज मैं दूर तक घूम फिर कर आऊंगा। नरसी सेठ दूर तक जंगल में घूमने निकल गए, पीछे से भगवान नरसी का रूप बनाकर आ गए और नौकरों से बोला कि वह ब्राह्मण मुझे कई दिनों से तंग कर रहा है आज वह मेरा रूप बनाकर आ सकता है उसको अंदर मत आने देना। यदि मेरा रूप बनाकर आए तो उससे कह देना कि चला जा और नहीं माने तो उसकी पिटाई कर देना। अब सेठ जी का रूप बनाकर भगवान तो घर के अंदर प्रवेश कर गए। जब सेठ नरसी जी घंटे बाद सैर सपाटा करके लौटे तो द्वार पर खड़े नौकर ने उन असली सेठ जी को कहा वहीं खड़ा हो जा बहरूपिए। तू बहरूपिया है, हमारे सेठ जी को बहुत परेशान कर दिया तूने, अब पता चला हमारे सेठ जी सही कह रहे थे कि कहीं मेरा रूप बनाकर ना आ जाए वह बहरूपिया, लेकिन तूने वही काम कर दिया।

लेकिन सेठ जी नौकर के कहने से नहीं रुके और नौकर के बिल्कुल सामने आ गए, तो नौकर ने कहा तूने सुना नहीं और उन्होंने नरसी की तरफ लठ उठा लिया। नरसी जी कहने लगे अरे, यह क्या कर रहा है तू, मैं तेरा सेठ हूं। नरसी सेठ, और यह तू मेरे से कैसे बात कर रहा है, नौकर बोला हमारे सेठ जी तो अंदर पहुंच चुके हैं और उन्होंने हमें कह दिया है कि वह ब्राह्मण मेरा रूप बनाकर आये तो उसकी पिटाई कर देना। हमारे सेठ तो अंदर हैं तू चला जा नही तो पिट जाएगा। नरसी जी बोले कैसी बात कर रहे हो। मैं तुम्हारा सेठ हूं, मैं तुम्हें नौकरी से निकाल दूंगा। तब नौकर लठ उठाकर असली नरसी सेठ को मारने के लिए चले तो सेठ जी वहां से भाग गए। सेठ जी ने सोचा यह तो वाकई बात गड़बड़ हो गई, जरूर उस ब्राह्मण ने पहले आकर सबको अपने काबू में कर लिया, अब वह मेरी सारी संपत्ति हड़प कर लेगा।

तब नरसी सेठ ने कोर्ट में रिपोर्ट की कि बहरूपिये ने मेरी सारी संपत्ति हड़प ली। कोर्ट ने उसी दिन नरसी सेठ की बही ज़ब्त कर ली, ताकि यदि नकली नरसी है तो कहीं बही में कुछ गड़बड़ी ना कर दे उसे कहीं पढ़ ना ले। अगले दिन पेशी लगी। कोर्ट में असली नरसी और नरसी रूपी भगवान खड़े हुए, परंतु दोनों की शक्ल एक सी थी। कोर्ट ने पहले शिकायतकर्ता असली नरसी जी की गवाही ली कि आप बताओ इस बही में क्या-क्या लिखा है? वह दो चार बातें बताकर चुप हो गए और कहने लगे “और तो मुझे याद नहीं।” जज ने कहा ठीक है। फिर जज ने नकली नरसी जी को बुलाया जो स्वयं भगवान थे। जज कहने लगा इस बही में ऐसा कोई लेख बता दो जिससे प्रमाणित कर सकें कि आप असली हैं तो भगवान ने सब कुछ सुना दिया। इस कारण कोर्ट ने नकली को तो असली सिद्ध कर दिया और असली को नकली सिद्ध कर दिया।

तब असली नरसी सेठ जंगल में जाकर बैठ गए और कहने लगे भगवान इसने मेरी सारी ही संपत्ति हड़प कर ली। यह मेरे साथ क्यों हुआ। उधर से वह भगवान उसके पास उसी ब्राह्मण रूप में आ जाते हैं और नरसी जी से पूछते हैं कि अब बताओ बेटा वो संपत्ति आपकी है क्या ?? नरसी जी बोले थी तो मेरी पर अब मेरी चल नहीं रही।भगवान बोले कि एक शर्त पर आपको यह संपत्ति दिलवा सकता हूं अगर आप इस सारी संपत्ति को धर्म, भंडारे में लगा दो तो।

तब नरसी जी को सारी बात समझ में आ गई। वह बोले जैसे आप कहोगे वैसे ही कर दूंगा। ब्राह्मण ने कहा बेटा अब इसका भंडारा कर दो, नहीं तो यह संपत्ति आपकी जान की दुश्मन हो जाएगी, आपसे ना तो मरा जाएगा ना जिया जाएगा, उसी दिन से नरसी जी ने भगवान के नाम पर भंडारे शुरू कर दिए और नरसी जी पाई-पाई को धर्म भण्डारे में लगाकर भगवान के भक्त बन गए अर्थात कृष्ण नाम धन के धनी हो गए।

भक्त नरसी जी की केवल एक ही लड़की थी जिसका विवाह नरसी ने पहले ही कर रखा था। एक समय नरसी जी की लड़की की लड़की यानि नातिन (दोहती) की शादी थी।

नरसी जी का कोई लड़का नहीं था और सांसारिक तौर पर नरसी जी गरीब हो चुके थे तो गरीब के साथ भात भरने कोई नहीं आया? नरसी जी के पास आसपास के 16 सूरदास (अंधे) आया करते थे जो नरसी के साथ प्रभु की चर्चा किया करते थे। उन्होंने नरसी को समझाया, नरसी हिम्मत मत हारो, भगवान ने जब इतनी लीला की है आपके साथ, तो वह आप से दूर नहीं हैं।

 नरसी जी ने लड़की के घर जाने के लिए किसी से गाड़ी मांगी, किसी का बैल मांगा। प्रथम तो गरीब को कोई उधार नहीं देता और देता है तो जो बेकार सा हो वही दे देते हैं। ऐसा ही नरसी जी के साथ हुआ क्योंकि उस समय नरसी जी के पास भौतिक धन नहीं था। यही वजह है कि गरीब जानकर नरसी जी को किसी ने पुरानी सी गाड़ी और बूढ़े बैल थमा दिए। गाड़ी में 16 अंधे और साथ में नरसी जी बैठे थे और वह गाड़ी लचर पचर करती हुई चल रही थी।

16 अंधों ने कहा नरसी जी ऐसे तो पहुंचने में कई दिन लग जायेंगे। तब नरसी जी ने भगवान को याद किया कि हे परमपिता! हम तो नीच आत्मा थे और हे मालिक आज ये आपत्ति आ गई मुझे तो बैलगाड़ी भी चलानी नहीं आती। ऐसे में वहां तक हम पहुंच भी नहीं पाएंगे और यदि पहुंच भी जाएंगे वहां पर तो हमारे पास कुछ देने के लिए नहीं है, पर आपकी कृपा से पहुंचना जरूर चाहते हैं। लड़की अपने पिता को देखकर प्रसन्न तो हो जाएगी, उसको पता है मेरे पिता के पास कुछ नहीं है।

इतने में वह भगवान कारीगर (बढ़ई) का रूप बनाकर एक थैले में औज़ार लेकर वहां पहुंच गए और हाथ देकर कहने लगे गाड़ी वाले भाई रोकना गाड़ी को। नरसी जी गाड़ी हांक रहे थे उन्होंने बोला यह तो रुकी रुकाई है, यह बैल चलते ही नहीं हैं। कभी खड़े हो जाते हैं, कभी बैठ जाते हैं और यह बैलगाड़ी भी टेढ़ी-मेढ़ी चलती है। बढ़ई रूप में भगवान नरसी से कहने लगे कि ‘भाई मैं आपके साथ कुछ दूर तक चलना चाहता हूं। रास्ते में मेरा गांव पड़ता है, मुझे बैठा लो गाड़ी में।’ नरसी जी कहने लगे कि ‘गाड़ी में तो बैठा लेंगे पर यह चल तो नहीं रही, यह तो बिल्कुल बेकार हुई पड़ी है। भगवान बोले, ‘मैं मिस्त्री हूं, मैं इसको ठीक कर लूंगा।’

नरसी जी, बढ़ई रूप में आये भगवान से कहने लगे, ‘मेरे पास पैसे नहीं हैं, मैं कुछ नहीं दे सकूंगा।’ भगवान ने कहा ‘मैं आपसे पैसे नहीं मांग रहा हूं। मैं आपकी गाड़ी में बैठकर भी तो चलूंगा।’ नरसी जी बोले तो ठीक है फिर आप इसे ठीक कर लो मैं आपको रास्ते भर भगवान का भजन सुनाता चलूंगा। भगवान ने दो चार हथौड़े इधर उधर से मारकर अपनी शक्ति से वह बैलगाड़ी बिल्कुल सही कर दी और भगवान उस गाड़ी में बैठ गए और कहने लगे भक्त जी आप बैठकर भजन कर लो मैं गाड़ी चला दूंगा।

भगवान ने एक मिस्त्री रूप में नरसी जी की बैलगाड़ी को ड्राइवर बनकर गंतव्य स्थान से रात रात में दो चार घंटे में ही पहुंचा दिया और कहने लगे भक्त जी मेरा तो स्थान आ गया। आप अपनी गाड़ी संभालो। जहां आपको जाना हैं वह स्थान यहां से थोड़ी दूरी पर रह गया है। आप आराम से पहुंच जाओगे। पहले तो जब भगवान गाड़ी चला रहे थे तो गाड़ी ऐसे चली थी जैसे हवाई जहाज हो और सबका भक्ति में मन लग रहा था जिससे 16 सूरदास और नरसी जी भक्ति में लीन हो गए थे क्योंकि परमात्मा पास बैठे थे।

जब भगवान उतर कर चले गए तो वह गाड़ी झटकम पटकम, लचरम पचरम फिर वैसे ही चलने लगी। तो अंधे कहने लगे नरसी जी, यह गाड़ी आप कहां ले गए, रास्ते से नीचे उतार दी क्या, बहुत ज्यादा इसमें झटके लग रहे हैं। नरसी जी कहने लगे गाड़ी तो ठीक चल रही है रास्ते पर। गाड़ी में बैठे अंधों ने पूछा कि कितनी दूर आ गए। नरसी जी बोले जो ड्राइवर था वह चला गया। वह कह रहा था कि सात कोस रह गया है यहां से आपका स्थान। अंधों ने कहा, सात कोस कैसे रह सकता है। अभी तो आज की सारी रात लगेगी कल का सारा दिन लगेगा और फिर अगली रात तक पहुंचेंगे। इतने में एक व्यक्ति आ गया, उससे पूछा कि जूनागढ़ कितनी दूर है? वह व्यक्ति कहने लगा सात कोस दूर है यहां से।

एक अंधा समझदार था उसका नाम शिक्षन नाम था। उस शिक्षन नाम के अंधे ने कहा, नरसी जी वह आदमी कहां गया जो गाड़ी चला रहा था जिसने गाड़ी ठीक करी थी। नरसी जी बोले वह तो उतर के चला गया। शिक्षन बोला देखो, अब ज्यादा से ज्यादा तीन चार पांच मिनट ही हुए हैं। उन्होंने देखा तो कहीं भी वह आदमी दिखाई नहीं दिया, सारे खेत खाली पड़े थे। शिक्षन बोला वह तो भगवान थे, अरे हम तो अंधे थे आपके तो आंख थी आप भी नही पहचाने भगवान को वह तो स्वयं भगवान थे।

अब नरसी जी और उनके साथ गए 16 सूरदास लड़की के यहां पहुंच गए। जहां उनके पास भात भरने के लिए कुछ भी नहीं था और पाटले पर पहुंच गए। समधन (लड़की की सास) ने नरसी पर ताना कस दिया। पड़ोसन कहने लगी क्या लाया तेरा भाती, क्या देगा भात में तेरे को। समधन कहने लगी जो कि थाली लेकर खड़ी थी, यह क्या देगा कंगाल, डले देगा डले (पत्थर)। 56 करोड़ का मालिक था लुटा दी सारी संपत्ति इसने। आज हमारी बेइज्जती करवाने आ गया है। यह पत्थर लेकर आया है और क्या डालेगा थाली में पत्थर डालेगा। यह सुनकर नरसी जी की आंखों में पानी आ गया और कहने लगे परमात्मा ज्यों राखोगे त्यों ही रहेंगे।’

समधन ने बार बार कहा कि इसने डले (पत्थर) डाले हैं तो नरसी जी की आंखों में आंसू आ गए। तभी आकाश से सोने और चांदी के दो पत्थर गिरे और समधन की थाली में आकर पड़े और नोटों की बारिश सी होने लगी। साथ ही, भगवान एक सामान से भरी हुई गाड़ी लेकर वहां पहुंच गए जिसमें लड़कियों को शादी में देने वाला दहेज का सारा सामान था। उस गाड़ी में लड़की, लड़की के ससुराल वालों, रिश्तेदारों को देने वाले नए कपड़े भी थे। भगवान ने वह गाड़ी वहां छोड़ दी और कहा कि लो उतार लो सामान…लड़की का भात नरसी जी लेकर आए हैं।

समधन और सभी लोगों की आँखें फटी की फटी रह गईं।

 नरसी जी अपने प्रभु श्रीकृष्ण का ह्रदय की गहराई से आभार प्रकट किया उन्होंने आकर उनकी लाज रखी।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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