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पहला करवाचौथ

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पहला करवाचौथ

शादी को मुश्किल से तीन महीने हुए थे। सब कुछ नया था — घर, रिश्ते, जिम्मेदारियाँ, और सबसे बढ़कर — एक नया जीवन साथी।

सासु माँ ने पहले ही बता दिया था कि “बिटिया, करवाचौथ का व्रत बड़ी श्रद्धा से करना, यह पति की दीर्घायु का प्रतीक है।”
उनकी बातों में ऐसा अपनापन था कि मन में खुशी भी थी और हल्की-सी घबराहट भी।

सुबह जल्दी उठकर मैंने अपनी साड़ी ठीक से पहनी, और सासु माँ के साथ रसोई में बैठकर सरगी ग्रहण की। माँ ने प्यार से कहा, “बिटिया, ये तेरे मायके से सरगी आई है — तेरी माँ ने खुद अपने हाथों से भेजी है।”
मेरे मन में भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। सरगी की थाली में मेवे, मिठाई, साड़ी और एक स्नेह से भरा पत्र था — “बेटी, यह तेरा पहला करवाचौथ है, तू सदा सुखी रहे।”
माँ की लिखावट देखते ही आँखें नम हो गईं।

पर एक कसक भीतर थी — मेरे पति, अर्जुन, बीकानेर गए हुए थे ऑफिस के काम से।
उन्होंने फोन पर कहा था, “इस बार शायद मैं नहीं आ पाऊँ, बहुत जरूरी मीटिंग है।”
मैंने मुस्कराते हुए कहा, “कोई बात नहीं, अगली बार साथ में मनाएँगे।” पर अंदर कहीं न कहीं मन उदास था।

दिन धीरे-धीरे बीतता गया। मोहल्ले की औरतें सज-संवर कर पूजा की तैयारी में लगी थीं। मैं भी नई लाल साड़ी, चूड़ियाँ और मेहंदी से सजी हथेलियाँ लेकर तैयार हुई।
रसोई से महकती खुशबू और हँसी-ठिठोली के बीच मैं बार-बार फोन उठाकर स्क्रीन देखती — शायद अर्जुन का संदेश आए।
उन्होंने सुबह थोड़ी देर बात की थी, फिर बोले, “थोड़ा व्यस्त हूँ, बाद में कॉल करता हूँ।”
उसके बाद चुप्पी।

शाम ढल रही थी, आसमान में हल्की चाँदनी उतर रही थी। मैं बालकनी में खड़ी होकर चाँद का इंतजार कर रही थी, तभी डोरबेल बजी।
मैंने दरवाज़ा खोला — और जो देखा, वह मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं था।
अर्जुन दरवाज़े पर खड़े थे, चेहरे पर थकान थी लेकिन मुस्कान अब भी वही थी।
मैंने हैरान होकर पूछा, “आप यहाँ? आप तो बीकानेर में थे न?”
उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “थोड़ा मुश्किल था… लेकिन तुम्हारा पहला करवाचौथ था, कैसे नहीं आता?”

मैं बोल ही नहीं पाई। बस आँखें छलक उठीं। उन्होंने बताया कि उन्होंने भी मेरे लिए व्रत रखा है।
“क्या! आपने भी?” — मैंने आश्चर्य से कहा।
वो हल्के से हँसे — “अगर तुम मेरे लिए भूखी रह सकती हो, तो मैं क्यों नहीं?”

चाँद निकल आया था। छत पर चाँदनी बिखरी थी। मैंने छलनी से उन्हें देखा — थकान के बावजूद उनकी आँखों में जो प्रेम था, वह किसी आशीर्वाद से कम नहीं।
हमने साथ-साथ व्रत खोला। माँ ने ताली बजाकर कहा — “देखो, सच्चे प्रेम का यही अर्थ है।”

पर उसी रात अर्जुन को हल्का बुखार हो गया। अगले दिन डॉक्टर ने बताया कि थकान और भूख के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई है।
मैं चिंता में थी, पर अर्जुन बार-बार कहते — “अगर फिर से वही करवाचौथ आए और मुझे फिर चलना पड़े, तो मैं फिर आऊँगा।”

एक सप्ताह तक वह बिस्तर पर रहे, और मैं उनके पास बैठकर सेवा करती रही।
उनकी हर मुस्कान, हर मज़ाक भरा वाक्य मुझे याद दिलाता रहा — प्रेम सिर्फ़ शब्दों में नहीं, कर्मों में होता है।

आज शादी को कई साल हो गए हैं। हर करवाचौथ की रात जब मैं छलनी से चाँद को देखती हूँ, तो आँखों के सामने वही दृश्य उतर आता है — थके कदमों से लौटते हुए अर्जुन, मुस्कुराता चेहरा, और वह पहली करवाचौथ की अमर स्मृति..

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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