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पाँच बोरी अनाज

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पाँच बोरी अनाज

आज हमने गरीबों को भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया…हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा सुनिए…

एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था। एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से भेंट हो, मेरी एक विनती उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।

कुछ दिनों बाद उसे वह साधु पुनः मिला। लकड़हारे ने उसे अपनी विनती का स्मरण कराया तो..साधु ने कहा कि- प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए केवल पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं जिससे वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।”

समय बीता। साधु उस लकड़हारे को पुनः मिला तो लकड़हारे ने कहा— ऋषिवर…!! अब जब भी आपकी प्रभु से भेंट हो तो मेरी यह विनती उन तक और पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।”

अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया! लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी विनती स्वीकार कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर साधुओ को गौ को गरीबो को और भूखों को खिला दिया और स्वयं भी भरपेट खाया। लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने पुनः उन सभी को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया।

यह सिलसिला प्रतिदिन चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह जरूरतमंदों को भोजन कराने में व्यस्त रहने लगा।

कुछ दिन बाद वह साधु पुनः लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा— “ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में केवल पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।”

साधु ने समझाया, “तुमने अपने जीवन की चिंता ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज साधुओ को गौ को गरीब व भूखों को खिला दिया! इसलिए प्रभु अब उन के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।”

कथासार- किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो ये मैंने दिया ! दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया।

वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को केवल परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??

दान किए से जाए दुःख,दूर होएं सब पाप,
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप..!

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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