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Quotes

सुविचार-सुन्दरकाण्ड-62

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जय श्री राधे कृष्ण …….

“जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच, मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच…..!!

भावार्थ:– तब (इसके बाद) वे सब जहाँ तहाँ चलीं गईं । सीता जी मन में सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जाने पर नीच राक्षस रावण मुझे मारेगा ।।

दीन दयाल बिरिदु संभारी ।
हरहु नाथ मम संकट भारी ।।

त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी, मातु बिपति संगिनी तैं मोरी, तजौं देह करू बेगि उपाई, दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई….!!

भावार्थ:– सीता जी हाथ जोड़कर त्रिजटा से बोलीं- हे माता ! तू मेरी विपत्ति की संगिनी है । जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं शरीर छोड़ सकूँ । विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं जाता…!!

सुप्रभात

आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो..

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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