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Quotes

सुविचार-सुन्दरकाण्ड-38

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जय श्री राधे कृष्ण …….

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी, जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी, तात कबहु मोहि जानि अनाथा, करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा…..!!

भावार्थ:- विभीषण जी ने कहा, हे पवनपुत्र, मेरी रहनी सुनो । मैं यहां वैसे ही रहता हूँ, जैसे दांतों के बीच में बेचारी जीभ। हे तात ! मुझे अनाथ जानकर सूर्य कुल के नाथ श्री रामचंद्र जी क्या कभी मुझ पर कृपा करेंगे……!!

सुप्रभात

आज का दिन प्रसन्नता से परिपूर्ण हो..

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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