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श्रवण कुमार -जीत की कुर्बानी

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श्रवण कुमार -जीत की कुर्बानी

शाम की चाय की चुस्की लेते हुए दीनानाथ जी ने अखबार नीचे रखा और सामने बैठे अपने बेटे, राघव, की तरफ एक नज़र डाली

“अरे राघव, सुना है शर्मा जी का बेटा अमेरिका से वापस आया है छुट्टियों में। पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बंट रही हैं। और एक तुम हो… इंजीनियरिंग की, गोल्ड मेडलिस्ट रहे, और अंत में क्या कर रहे हो? इसी कस्बे में बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहे हो
पिछले तीन सालों से, जब से राघव मुंबई की अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर वापस इस छोटे शहर में आया उन्हें लगता था कि राघव शहर की दौड़-भाग झेल नहीं पाया

राघव ने स्कूटर पर कपड़ा मारा और मुस्कुराते हुए बोला, “पापा, अमेरिका में वो सुकून कहां जो आपके साथ शाम की चाय पीने में है?”

“रहने दे ये बातें,” दीनानाथ जी झुंझलाए। “सुकून से पेट नहीं भरता। काबिलियत थी तुझमें,

राघव चुप रहा। वह जानता था कि अगर उसने सच बोला तो ‘अपने’ रूठ जाएंगे। उसने चुपचाप बाल्टी उठाई और अंदर चला गया। रसोई में उसकी मां, सुमित्रा, खाना बना रही थीं। सुमित्रा को पिछले तीन सालों से पैरालिसिस (लकवा) की शिकायत थी, हालांकि अब वह काफी ठीक थीं, लेकिन उन्हें सहारे की ज़रूरत थी।

राघव ने मां को देखा और सोचा, “कैसे कह दूं पापा से कि मैं हारा नहीं था, बस मां की वो एक कॉल… जिसमें इनकी आवाज़ लडखडा रही थी, उसने मेरे कदमों को मुंबई में रुकने ही नहीं दिया।”

अगले दिन रविवार था। घर के बाहर एक लंबी, काली रंग की लग्जरी गाड़ी आकर रुकी। गाड़ी से सूट-बूट पहने एक नौजवान उतरा। वह मोहित था, राघव का कॉलेज का दोस्त और अब एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का सीईओ।

दीनानाथ जी ने मोहित का स्वागत किया। मोहित ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया।

“अरे बेटा मोहित, तुम तो बहुत बड़े आदमी बन गए हो। टीवी पर देखा था तुम्हारा इंटरव्यू,” दीनानाथ जी गदगद हो रहे थे। फिर उन्होंने एक ठंडी सांस ली

राघव ने पानी का गिलास मोहित को दिया और नज़रों से उसे चुप रहने का इशारा किया। लेकिन मोहित से रहा नहीं गया। उसने पानी पिया और दीनानाथ जी के पास कुर्सी खिसका कर बैठ गया।

“अंकल, आपको शायद कुछ पता नहीं है,” मोहित ने गंभीर स्वर में कहा।

“क्या नहीं पता?” दीनानाथ जी ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा।

“तीन साल पहले, जब हमारी कंपनी को जर्मनी में एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मिला था, तो उसका हेड मुझे नहीं, राघव को चुना गया था। उसका पैकेज इतना था कि आप इस पूरे मोहल्ले को खरीद सकते थे।
दीनानाथ जी के हाथ से चाय का कप हिल गया। “क्या? जर्मनी? लेकिन राघव ने तो कहा था कि उसे नौकरी से निकाल दिया गया है मंदी के कारण… इसलिए वो वापस आ रहा है।”

मोहित ने राघव की तरफ देखा, जो अब सिर झुकाए खड़ा था।

“उसने झूठ बोला अंकल,” मोहित की आवाज़ भारी हो गई। “जिस दिन उसकी फ्लाइट थी, उसी सुबह आंटी को दूसरा अटैक आया था। आपने फ़ोन पर बस इतना कहा था कि ‘राघव, मां की तबीयत ठीक नहीं है, देख ले अगर आ सके तो’। राघव एयरपोर्ट के गेट पर था। उसके एक हाथ में करोड़ों के सपनों का टिकट था और दूसरे कान पर फोन, जिससे घर की उदासी झांक रही थी।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी, जो व्हीलचेयर पर बैठी सुन रही थीं, उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।
मोहित ने आगे कहा, “मैंने उसे बहुत समझाया था कि इलाज के लिए पैसे भेज दे, नर्स रख ले। पर राघव ने कहा था—’मोहित, पैसा तो मैं बाद में भी कमा लूंगा, पर अगर मां को कुछ हो गया और मैं पास नहीं रहा, तो उस कामयाबी के बिस्तर पर मुझे नींद नहीं आएगी।’ वो अपना रेजिग्नेशन (इस्तीफा) देकर उसी वक्त वापस आ गया। अंकल, वो हारा नहीं है, उसने अपनी जीत की कुर्बानी दी है—सिर्फ आप दोनों के लिए।”

दीनानाथ जी स्तब्ध थे बेटे ने अपने सपनों की चिता जलाकर उनके बुढ़ापे की लाठी को मज़बूत किया था।

मोहित चला गया। शाम ढल चुकी थी।
राघव हमेशा की तरह पापा की दवाइयां निकालने लगा। दीनानाथ जी उसे एकटक देख रहे थे। आज उन्हें राघव के साधारण कपड़ों में एक राजा दिखाई दे रहा था।
“राघव…” दीनानाथ जी की आवाज़ कांपी।

“जी पापा, पानी चाहिए?”

दीनानाथ जी ने राघव का हाथ पकड़ लिया। उनकी बूढ़ी आंखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। “बेटा, लोग कहते हैं कि श्रवण कुमार सिर्फ कहानियों में होते थे। मुझे नहीं पता था कि एक श्रवण कुमार मेरे घर में भी है, और मैं अंधा होकर उसे पहचान नहीं पाया। तूने इतना बड़ा त्याग किया और उफ़ तक नहीं की?”

राघव ने पिता के आंसू पोंछे और मुस्कुराया, “पापा, सपने तो मेरी आंखों में थे, लेकिन मेरी दुनिया तो आप और मां हैं। अगर दुनिया जीतकर भी घर खाली मिलता, तो वो जीत हार से भी बदतर होती। मैंने सपनों से दूरी बनाई, ताकि अपनों से दूर न होना पड़े।”

दीनानाथ जी ने बेटे को गले लगा लिया। आज उन्हें समझ आ गया था कि करियर और पैसे से बड़ा भी एक पद होता है—और वह है ‘जिम्मेदार बेटा’ होने का। उस दिन के बाद दीनानाथ जी ने कभी राघव की तुलना किसी से नहीं की, क्योंकि वे जान गए थे कि उनका बेटा वो हीरा है जिसकी चमक बाज़ार में नहीं, बल्कि घर के आंगन में दिखाई देती है।

सपनों की उड़ान ज़रूरी है, पर कभी-कभी ज़मीन पर पैर जमाए रखना, आसमान छूने से भी बड़ा काम होता है🙏

जय श्री राम

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Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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