कर्मों की गूँज: एक निस्वार्थ भेंट
दिल्ली के एक बड़े और प्रतिष्ठित अस्पताल में एक दिन एक अत्यंत गंभीर मरीज को लाया गया। उसकी हालत इतनी नाजुक थी कि उसे तुरंत गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में भर्ती करना पड़ा। जब अस्पताल के मालिक और मुख्य डॉक्टर को इस केस के बारे में पता चला, तो वे स्वयं उसकी स्थिति देखने पहुँचे।
डॉक्टर ने मरीज को गौर से देखा और स्टाफ को सख्त निर्देश दिए कि इस मरीज के इलाज में कोई कमी नहीं आनी चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि उससे इलाज के लिए एक भी पैसा अग्रिम (Advance) न लिया जाए।
अस्पताल के कर्मचारियों के लिए यह आदेश थोड़ा अजीब था, क्योंकि वहाँ के कड़े नियम थे, लेकिन डॉक्टर का आदेश सर्वोपरि था। डॉक्टर और पूरी मेडिकल टीम ने पूरी लगन से उस मरीज की सेवा की। धीरे-धीरे मरीज की हालत में सुधार होने लगा और वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया।
जब मरीज को अस्पताल से छुट्टी मिलने का समय आया, तो अकाउंट विभाग ने दवाइयों, आईसीयू और डॉक्टर की फीस का एक भारी-भरकम बिल तैयार किया।
जब मैनेजर वह बिल लेकर डॉक्टर के पास पहुँचा, तो डॉक्टर ने शांत भाव से कहा, “इस मरीज से एक भी पैसा नहीं लेना है।” मैनेजर हैरान रह गया, पर डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा कि मरीज को उनके केबिन में लाया जाए।
मरीज को व्हीलचेयर पर डॉक्टर के सामने लाया गया। डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा, “क्या आपने मुझे पहचाना?” मरीज को चेहरा कुछ जाना-पहचाना तो लगा, पर वह याद नहीं कर पा रहा था। तब डॉक्टर ने उसे पुरानी याद दिलाई।
डॉक्टर ने बताया कि एक बार जब वे अपने परिवार के साथ एक सुनसान रास्ते से गुजर रहे थे, तो अचानक उनकी कार खराब हो गई थी। चारों तरफ जंगल था और अंधेरा होने लगा था। उनका परिवार बहुत डरा हुआ था। तभी यह व्यक्ति अपनी बाइक पर वहाँ पहुँचा था। उसने बिना किसी स्वार्थ के कार का बोनट खोला और उसे ठीक कर दिया। जब डॉक्टर ने उसे उसकी मेहनत के पैसे देने चाहे, तो उसने विनम्रता से मना कर दिया था। उस व्यक्ति ने तब कहा था, “मैं मुसीबत में फँसे इंसान से पैसे नहीं लेता, मेरी मेहनत का हिसाब तो ऊपर वाला (भगवान) रखता है।”
मरीज की आँखों में चमक आ गई, उसे वह घटना याद आ गई। डॉक्टर ने भावुक होकर कहा, “उस दिन तुम्हारी उस बात ने मेरी सोच बदल दी। मैंने तय किया था कि मैं भी किसी जरूरतमंद की मदद इसी तरह बिना किसी लालच के करूँगा। आज तुम मेरे लिए सिर्फ एक मरीज नहीं, बल्कि मेरे गुरु हो। तुमने जो बीज बोया था, आज वही फल बनकर तुम्हारे पास लौटा है।”
मरीज की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने केबिन में लगी ईश्वर की तस्वीर के सामने हाथ जोड़े और महसूस किया कि उसके द्वारा की गई छोटी सी निस्वार्थ सेवा का फल उसे आज जीवनदान के रूप में मिला है।
इंसान के द्वारा किए गए अच्छे कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते। जो हम दूसरों को देते हैं, वही कई गुना होकर हमारे पास वापस आता है। निस्वार्थ सेवा ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है।
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जय श्रीराम