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अपनों की गद्दारी

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अपनों की गद्दारी

गाँव के बाहर एक घना जंगल था। वही जंगल गाँव की पहचान था—बरसात में हरियाली, गर्मियों में ठंडी छाँव और सर्दियों में लकड़ियों की ऊष्मा। उसी जंगल के किनारे रहता था रघु, सीधा-सादा, मेहनती और सब पर भरोसा करने वाला इंसान। जंगल उसके लिए सिर्फ पेड़ नहीं थे, बल्कि उसकी जड़ें थेउसके पिता ने उसी जंगल से लकड़ी काट-काटकर उसे पढ़ाया था, और रघु ने तय किया था कि अब वह जंगल को बचाएगा।

रघु का सबसे करीबी दोस्त था सलीम। बचपन साथ बीता था, रोटियाँ आधी-आधी बाँटी थीं, सपने भी साझा थे। रघु को कभी शक नहीं हुआ कि वही सलीम एक दिन उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी तीली बन जाएगा।

एक दिन जंगल में अचानक आग लग गई। देखते-देखते लपटें आसमान छूने लगीं। पेड़ चिल्ला रहे थे, पक्षी भाग रहे थे, और हवा में जलती हुई लकड़ी की बदबू फैल गई। रघु बदहवास होकर पानी, मिट्टी, जो मिला उससे आग बुझाने दौड़ा। लेकिन आग मानो किसी साज़िश की तरह फैलती जा रही थी।

तभी रघु की नज़र पड़ी—सलीम दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसकी आँखों में डर नहीं, अफ़सोस नहीं… सिर्फ़ संतोष था। रघु का कलेजा काँप गया। बाद में सच्चाई सामने आई—सलीम ने ही जंगल के एक हिस्से में आग लगाई थी। उसे ठेकेदारों से पैसे मिले थे। जंगल जलेगा, ज़मीन खाली होगी, और सड़क बनेगी। सलीम को लगा, “जंगल तो है ही क्या? पेड़ ही तो हैं।”

पर उसे यह नहीं समझ आया कि वह जिस लकड़ी से तीली बना रहा था, वह उसी जंगल की जड़ से थी। वही जड़, जिसने उसे भी पाला था।

जंगल जलता रहा… और अपनों की गद्दारी का ज़हर रघु की रगों में उतरता रहा। आग बुझ गई, पर भरोसा राख हो चुका था। सलीम को पैसे मिल गए, पर नींद छिन गई। गाँव ने मुँह मोड़ लिया। बच्चे उसे देख डरने लगे—क्योंकि जिसने अपनी जड़ें जला दी हों, वह किसी का सगा नहीं हो सकता।

रघु ने जले हुए जंगल में नए पौधे लगाए। हर पौधे के साथ एक सबक बोयादुश्मन की चोट भर सकती है, पर अपनों की गद्दारीज़िंदगी भर जलाती रहती है।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
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