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थानेदार बेटा

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थानेदार बेटा

बहु ससुर के पास आकर बोली ” पापा जी  मैंने आपके बेटे को दस बार फोन कर दिये। ना फोन उठाया और ना वापस फोन किया। ससुर ने पूछा ” कोई जरूरी काम था क्या उससे??” बहु बोली “मेरी कमरदर्द की गोलियां खत्म हो गई है। वही मंगवानी थी।”

ससुर गुस्से मे बोले ” आने दे उसको। बहुत दिन हो गए। आज खबर लेता हूँ।” इत्तेफाक से थानेदार बेटा उसी समय घर आ गया। साथ मे उसका एक दोस्त भी था। पिताजी ने बेटे को पास बुलाया फिर जूता लेकर पीटना शुरू कर दिया। ” बहु सुबह से फोन कर रही है। उठाया क्यों नही तूने। तू थानेदार घर से बाहर है समझा।”

थानेदार बेटा मुस्कराते हुए बाप से पिट रहा था और उधर दोस्त की आँखों मे आंसू आ गए थे। ।” पिताजी से आठ दस जुते खाने के बाद बेटा बोला ” आइंदा ख्याल रखूँगा बापूजी। लग रही है अब रहने दो।

बापूजी ने थक कर पिटाई बन्द कर दी फिर बहु से कहा” बेटा आइंदा ऐसी हरकत करे तो बताना। इसकी सारी खुम्मारी उतार दूंगा। मनमानी जरा भी नही चलने दूंगा। बहु पति को जीभ दिखाकर मुस्कराते हुए अंदर चली गई। ” थानेदार बेटा अपने दोस्त के साथ वापस बाहर चला गया। रास्ते मे थानेदार बोला ” बाप से पिट कर तो मै आया हूँ तू उदास क्यों है? दोस्त बोला ” साले तू पिट कर नही आया। स्वर्ग का आनन्द लेकर आया है। इस उम्र मे बाप की पिटाई कहाँ नशीब होती है?  तुझे पिटते देख कर मुझे मेरा बाप याद आ गया। अब इस दुनिया मे नही है। काश होते तो मुझे भी उनकी डांट मिल जाती। मै भी तेरी तरह हँसते हुए उनसे मार खाता। जिसको भी अपने पीता जी की मार से भी प्यार है वो शेयर कर दो जी।

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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