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संस्कारी बहु

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संस्कारी बहु

चालीस की उम्र पार कर चुके मोहन ने आखिरकार अपनी सहकर्मी सुधा से शादी कर ली। दोनों की जिंदगी के सफर में एक समानता थी—अकेलापन। सुधा बचपन से अनाथ थी और चाचा-चाची के सहारे बड़ी हुई थी, वहीं मोहन ने भी कम उम्र में अपने पिता को खो दिया था। घर में उसकी दुनिया सिर्फ उसकी बीमार मां, सुषमा जी थीं।
शादी के बाद सुधा ने इस घर को सिर्फ संभाला ही नहीं, बल्कि उसमें अपनापन भर दिया। वह सुबह से शाम तक घर के हर काम में लगी रहती, और सबसे ज्यादा ध्यान रखती अपनी सास का—दवा, खाना, आराम—सब कुछ समय पर।
लेकिन धीरे-धीरे एक बदलाव आया…पहले जहां सास-बहू साथ बैठकर खाना खाती थीं, अब सुधा चाय-नाश्ता देने के बाद थोड़ी दूर बैठ जाती और खुद कुछ अलग खाती।
एक दिन सुषमा जी ने देखा—
“मांजी, ये लीजिए चाय-बिस्किट…”
सुधा ने प्यार से कहा और खुद एक लाल डिब्बा लेकर दूर बैठ गई।
सुषमा जी के मन में हल्की सी शंका उठी

“ये मुझसे अलग बैठकर क्या खाती है?”
“कहीं कुछ अच्छा तो नहीं छुपा रही?”
बीमारी के कारण वे उठकर देख भी नहीं सकती थीं, लेकिन मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
उस रात उन्हें नींद नहीं आई।
मन बार-बार उसी लाल डिब्बे की ओर खिंच रहा था।
आखिरकार, अगले दिन हिम्मत जुटाकर वे धीरे-धीरे रसोई तक पहुंचीं।
कांपते हाथों से उन्होंने ऊपर रखा वही लाल डिब्बा उतारने की कोशिश की—
धड़ाम!
डिब्बा गिर पड़ा… और उसके अंदर की चीजें फर्श पर बिखर गईं।
सुषमा जी ने झुककर देखा—
वो कोई खास मिठाई नहीं थी…
बल्कि टूटे हुए बिस्किट के छोटे-छोटे टुकड़े थे।

तभी मोहन और सुधा दौड़ते हुए आए।
“क्या हुआ मांजी?” सुधा ने चिंता से पूछा।
सुषमा जी थोड़ा झेंप गईं—
“वो… दवाई से मुंह कड़वा था, तो शक्कर ढूंढ रही थी…”
सुधा ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप फर्श साफ करने लगी।
लेकिन उस पल…
सुषमा जी के अंदर कुछ टूट गया—
उनकी सोच।
“मैं कितनी गलत थी…”
“बहू मुझे पूरे बिस्किट देती है, और खुद टूटे टुकड़े खाती है…!”
अगले दिन, जब सुधा फिर चाय लेकर आई, तो सुषमा जी ने उसे रोक लिया—
“बहु, मुझे पूरे बिस्किट मत दिया करो… वो टुकड़े ही दे दिया करो… मेरे दांत भी जल्दी चबा लेंगे…”
सुधा मुस्कुरा दी—
“अरे मांजी, वो तो बस पैकेट खोलने पर जो टूट जाते हैं, उन्हें मैं अलग रख देती हूं…
आपके पास लोग आते रहते हैं… अगर मैं आपको वो दूं, तो अच्छा नहीं लगेगा।
घर की इज्जत भी तो देखनी होती है… इसलिए मैं अंदर बैठकर खा लेती हूं…” इतना सुनते ही सुषमा जी की आंखें नम हो गईं।
आज उन्हें एहसास हुआ—रिश्ते खून से नहीं, सोच और संस्कार से बनते हैं।

उन्होंने सुधा का हाथ थाम लिया…
और मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया—
“सच में… मैं बहुत ही खुशकिस्मत हूं…”

जय श्री राम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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