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संयम रखना

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संयम रखना

एक युवती ट्रेन में चढ़ी और देखा कि उसकी सीट पर एक आदमी बैठा हुआ है। उसने विनम्रता से टिकट देखा और कहा, “सर, मुझे लगता है कि आप मेरी सीट पर बैठे हैं।”

आदमी ने गुस्से में अपना टिकट निकाला और चिल्लाया, “ध्यान से देखो! यह मेरी सीट है! तुम अंधी हो क्या?!”

लड़की ने चुपचाप उसका टिकट ध्यान से देखा और बहस करना बंद कर दिया। वह शांति से उसके बगल में खड़ी हो गई।

ट्रेन चलने के कुछ मिनट बाद लड़की ने हल्की आवाज़ में कहा, “सर, आप गलत सीट पर नहीं बैठे हैं, लेकिन गलत ट्रेन में बैठे हैं। यह ट्रेन कोलकाता जा रही है, और आपकी टिकट मुंबई की है।”

कुछ संयम ऐसा होता है जो लोगों को उनके व्यवहार पर पछताने पर मजबूर कर देता है। अगर चिल्लाने से सब कुछ हल हो जाता, तो गधों का ही राज होता!

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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