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शिक्षा का दर्पण

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शिक्षा का दर्पण

सुबह के नौ बज रहे थे जब मेरी आँख खुली। अलार्म बजते-बजते रुक गया था और मैं गहरी नींद में सोया रहा। फोन उठाते ही नौ मिस्ड कॉल्स – आठ ऑफिस से और एक मम्मी का। मेरा दिल बैठ गया।

मैं आदित्य सिंघानिया, चंडीगढ़ की एक नामी कंस्ट्रक्शन कंपनी का प्रोजेक्ट हेड। आज दस बजे सेक्टर सत्रह के पांच सितारा होटल में एक करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट की बोली थी और उस बोली की अगुवाई मुझे करनी थी।

जल्दी से तैयार हुआ। बाहर निकला तो पता चला कार स्टार्ट नहीं हो रही। बैटरी खत्म। ड्राइवर राजू का फोन लगाया तो पता चला वो छुट्टी पर गाँव गया है। पत्नी नेहा ने कहा- “मुझे तो बच्चों को डॉक्टर के पास ले जाना है, मेरी कार मत ले जाना। “

मैंने कहा ठीक है मैं देख लूंगा। नेहा बच्चों को लेकर पिछले तीन दिन से परेशान थी। उसे कार की जरूरत थी।

बस स्टॉप की तरफ भागा। वहाँ पहुँचा तो देखा लंबी लाइन थी। मैं हाँफ रहा था, पसीने से तर। तभी एक ऑटो आता दिखा। खाली था। “भई, सेक्टर सत्रह, जल्दी चलो,” मैंने कहा और ऑटो में कूद गया।

“जी साहब, बैठिए,” ऑटो चालक ने मुस्कुराते हुए कहा। उम्र करीब पच्चीस-छब्बीस साल, चेहरे पर एक अजीब सी शांति।

हम सेक्टर पंद्रह से होते हुए निकले। मैं लगातार घड़ी देख रहा था। पौने दस बज रहे थे। दस बजे तक पहुँचना था।अचानक ऑटो रुक गया। मैंने देखा, एक किराने की दुकान के सामने खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने हाथ उठाया था। वो अपने बाएँ पैर से लंगड़ा रही थी और एक हाथ में दवा की थैली थी।

“क्या कर रहे हो? मुझे जाना है,” मैंने चिढ़कर कहा।

“साहब, वो आंटी बहुत परेशान लग रही हैं। पैर में तकलीफ है। एक मिनट, बस पूछ लेता हूँ कहाँ जाना है।”

“नहीं-नहीं, मुझे ले चलो पहले। मेरी मीटिंग है।”

“साहब, वो देखो वो कितनी तकलीफ में हैं। आपको देर हो रही है, मैं समझता हूँ। पर मैं उन्हें देखकर नहीं जा सकता।” उसने ऑटो उस महिला के पास ले जाकर रोका।

मैं गुस्से में लाल-पीला हो रहा था। हाथ में फोन लेकर दूसरा ऑटो खोजने लगा। पर कोई नहीं मिल रहा था। ऑटो चालक ने उतरकर उस महिला से बात की। फिर उन्हें धीरे से ऑटो में बैठाया।

“साहब, ये आंटी सेक्टर बीस में रहती हैं। आपको सेक्टर सत्रह, उन्हें सेक्टर बीस। पहले इन्हें छोड़ देता हूँ, फिर आपको। आधे घंटे से ज्यादा नहीं लगेगा।”

मैं कुछ नहीं बोला। बस दांत पीसता रहा। रास्ते में वो महिला ऑटो चालक से बातें करने लगी। “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?”

“करण, आंटी।”

“बहुत अच्छा किया तुमने मुझे रोका। मेरा पैर बुरी तरह दर्द कर रहा था। डॉक्टर के पास अकेले गई थी, वापसी में परेशान हो गई।”

“कोई बात नहीं आंटी, मैं तो इसी इलाके में घूमता हूँ। कभी जरूरत हो तो फोन कर देना।”

उसने अपना नंबर दे दिया महिला को। मैं सोच रहा था – ये कैसा ऑटो चालक है? फ्री में सर्विस दे रहा है?

महिला उतरी तो करण ने उन्हें घर के अंदर तक छोड़ा। पाँच मिनट बाद वापस आया।

“सॉरी साहब, देर कर दी। अब आपको तेजी से ले चलता हूँ।” हम आगे बढ़े। मैं चुप था। गुस्सा तो था, पर साथ ही एक अजीब सी कौतूहल भी।

“करण, तुम ऐसा क्यों करते हो? अपना काम छोड़कर किसी को मुफ्त में ले जाना। पैसे नहीं लिए उससे।”

करण मुस्कुराया। “साहब, पैसे तो कमा ही लूँगा। पर मौका मिले तो किसी की मदद कर देना, ये भी तो जरूरी है।”

“पर इससे तुम्हारा समय और पैसा दोनों बर्बाद होता है।”

“साहब, अस्सी साल के एक सज्जन ने मुझे यही सिखाया है। कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।” उसकी बात में एक गहराई थी। मैं चुप हो गया।

हम सेक्टर सत्रह पहुँचे। ठीक दस बजकर पाँच मिनट हुए थे। मैं होटल के अंदर भागा। बोली शुरू हो चुकी थी। मुझे अंदर नहीं घुसने दिया गया। सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया- “सर, मीटिंग शुरू हो गई है। अब एंट्री नहीं हो सकती।”

मैं वहीं खड़ा रह गया। एक करोड़ों रुपए का प्रोजेक्ट हाथ से निकल गया। बाहर निकला तो देखा करण का ऑटो अभी भी खड़ा था। वह मुझे देखकर हड़बड़ा गया। “सॉरी साहब, आप लेट हो गए?”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। बस ऑटो में बैठ गया। “चलो, सेक्टर पैंतालीस, मेरा घर।”

रास्ते भर मैं चुप रहा। करण भी चुप था। फिर उसने धीरे से कहना शुरू किया।

“साहब, एक कहानी सुनोगे? मेरे गुरु की।”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया, पर वह बोलता रहा। “पाँच साल पहले मैं साइकिल रिक्शा चलाता था। दसवीं पास था, और कुछ नहीं कर सकता था। एक दिन सेक्टर सत्ताइस में एक बुजुर्ग सज्जन ने मेरा रिक्शा रोका। बहुत सज्जन लगते थे। सफेद कुर्ता-पाजामा, हाथ में किताबें। पूछा – सेक्टर बीस चलोगे? मैंने हाँ कह दिया।

रास्ते में उन्होंने मुझसे बातें कीं। पूछा क्या करते हो, पढ़े-लिखे हो क्या। मैंने सब बता दिया।अगले दिन फिर मिले। फिर अगले दिन। फिर एक दिन उन्होंने कहा – ‘बेटा, रोज रिक्शा चलाने से क्या होगा? कुछ पढ़-लिख लो।’
मैंने कहा- ‘सर, पढ़ाई का खर्चा कहाँ से लाऊँ?’

उन्होंने मुस्कुराकर कहा- ‘पढ़ाई का खर्चा मैं उठाऊँगा। बस तुम मेहनत करो।’

साहब, वो सज्जन थे प्रोफेसर श्याम सुंदर माथुर। रिटायर्ड प्रिंसिपल, एमएम कॉलेज के। उन्होंने मुझे न सिर्फ पढ़ाया, बल्कि हर दिन शाम को दो घंटे खुद समय निकालकर मुझे पढ़ाते रहे। गणित, अंग्रेजी, हिंदी- सब।

उनकी अपनी कहानी भी दिलचस्प है। उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था। दो बेटियाँ – दोनों शादीशुदा, एक दिल्ली में, एक मुंबई में। वो अकेले रहते थे। पढ़ाना उनका जुनून था। कॉलेज से रिटायर होने के बाद भी वो पढ़ाना नहीं छोड़ पाए।

उन्होंने मुझसे कहा था- ‘करण, मैं तुझे इसलिए नहीं पढ़ा रहा कि तू मेरा कुछ करे। मैं इसलिए पढ़ा रहा हूँ कि पढ़ाना मेरी सांस है। मैं तुझमें एक अच्छा नागरिक बनाना चाहता हूँ, एक अच्छा इंसान बनाना चाहता हूँ।’

मैंने बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। फिर उन्होंने कहा – ‘अब कुछ और कर।’ मैंने कहा – ‘सर, अब मैं कमाना चाहता हूँ।’ उन्होंने यह ऑटो दिलवाया। कहा – ‘इससे कमा, पर पढ़ना मत छोड़। मैं हूँ ना तेरे लिए।’

आज मैं बीकॉम फाइनल इयर में हूँ। और हर दिन सुबह नौ बजे सर को उनके घर से लेकर लाइब्रेरी जाता हूँ। दोपहर तीन बजे वापस ले आता हूँ। बीच में कितने भी सवारी हों, मैं यह काम नहीं छोड़ता।” उसकी आँखों में नमी थी।

“साहब, सर ने मुझे सिखाया कि असली अमीरी पैसे से नहीं, दिल से होती है। वो खुद इतने बड़े आदमी हैं, पर कभी मुझसे ऊँची आवाज़ में बात नहीं की। कभी मुझे छोटा नहीं समझा। आज मैं जो कुछ हूँ, उन्हीं की वजह से हूँ।”

करण की बातें सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। प्रोफेसर श्याम सुंदर माथुर… यह नाम मैं कहाँ सुना था? और फिर याद आया।

बीस साल पहले। मैं एमएम कॉलेज में बीएससी फाइनल इयर का छात्र था। पापा की छोटी सी दुकान थी सेक्टर बाईस में। एक दिन पापा को हार्ट अटैक आया। बाईपास सर्जरी के लिए दो लाख चाहिए थे। हमारे पास कुछ नहीं था। मेरे कॉलेज की फीस से पापा का इलाज हो पाया , अब मेरे पास कॉलेज की फीस के पैसे नहीं थे

मैं कॉलेज छोड़ने वाला था। तभी प्रिंसिपल सर ने बुलाया। प्रोफेसर माथुर। उन्होंने मुझसे सारी बात पूछी। फिर एक चेक थमाया – दो लाख का। उन्होंने कहा – ‘बेटा, पढ़ाई जारी रखो। यह पैसे मैने किसी नेक काम के लिए जमा किए थे। आज उनका सही उपयोग हो गया।’

मैं रो पड़ा था। उनके पैर छुए थे। उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया- ‘आगे बढ़ो, बड़े आदमी बनो।’

मैंने वादा किया था- ‘सर, एक दिन लौटाऊँगा यह पैसे।’

उन्होंने मुस्कुराकर कहा था – ‘पैसे नहीं बेटा, बस इतना करो कि किसी और की मदद कर देना। यही असली वापसी होगी।’

आज बीस साल बाद मैं उनके पास नहीं गया। पैसे तो लौटा दिए थे अगले ही साल, पर उनसे मिलने कभी नहीं गया। अपनी दुनिया में मस्त हो गया। शादी की, बच्चे हुए, प्रमोशन मिले, बंगला बना, गाड़ियाँ आईं – पर वो बुजुर्ग, जिसने मुझे संभाला था, वो मेरी यादों से गायब हो गए।

आज उनका नाम सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। “करण… तुम्हारे सर का घर कहाँ है?”

“सेक्टर सत्ताइस, साहब। एचआईजी फ्लैट नंबर चार सौ बारह।”

“वहीं चलो। अभी।”

करण ने आईने में देखा। हैरान था। पर ऑटो मोड़ दिया।

सेक्टर सत्ताइस पहुँचे। मैंने घंटी बजाई। दरवाजा खुला तो सामने वही चेहरा था – थोड़ा बूढ़ा, थोड़ा थका, पर वही मुस्कान।

“जी…?”

“सर… मैं आदित्य हूँ। आदित्य सिंघानिया। बीस साल पहले… आपने मेरी फीस के लिए…”

उन्होंने गौर से देखा। फिर आँखें चमक उठीं। “अरे! आदित्य! हाँ-हाँ, याद आया। बीएससी वाले। कैसे हो बेटा?”

मैं उनके पैरों पर गिर पड़ा। सिसकियाँ निकल गईं। “सर, माफ कर दो मुझे। इतने साल… कभी नहीं आया आपसे मिलने। आपका एहसान भूल गया।”

उन्होंने मुझे उठाया और गले लगा लिया। “बेटा, एहसान कैसा? मैंने तो बस अपना फर्ज निभाया था। तुम आगे बढ़े, यही मेरे लिए खुशी की बात है। अंदर आओ।”

मैं अंदर गया। छोटा सा फ्लैट था, पर किताबों से भरा हुआ। एक कोने में तस्वीरें थीं – उनकी पत्नी के साथ, बेटियों के साथ। एक कोने में मेज पर किताबें रखी थीं।

करण भी अंदर आ गया था। वह मुझे देखकर हैरान था।

“करण, यह मेरे भी गुरु है,” मैंने कहा। “बीस साल पहले इन्होंने मेरे कॉलेज की फीस जमा करवाई थी। मेरी जिंदगी बचाई थी।”

करण की आँखें फैल गईं। फिर वह मुस्कुराया। “तो साहब, आप भी सर के शिष्य हो?”

“हाँ करण, और आज तुमसे मिलकर मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने गुरु को भूल गया। तुमने तो रोज सेवा की, पर मैं…”

प्रोफेसर माथुर ने मेरा हाथ थाम लिया। “बेटा, कोई बात नहीं। आज आ गए ना। यही बहुत है। बैठो, चाय पीते हैं।”

उस दिन मैं तीन घंटे वहाँ बैठा रहा। पुरानी यादें ताजा हुईं। पापा के बारे में बातें हुईं, जो अब इस दुनिया में नहीं थे। मेरी जिंदगी के बारे में बताया। नेहा के बारे में बताया। बच्चों के बारे में बताया।

जब जाने लगा तो प्रोफेसर सर ने कहा – “आदित्य, एक वादा करो।”

“क्या सर?”

“करण को अपनी कंपनी में नौकरी दो। यह बहुत मेहनती है। पढ़ाई भी कर रहा है। बस किसी सहारे की जरूरत है।”

मैंने करण की तरफ देखा। वह झेंप गया। “सर, यह तो मैं आज ही करूँगा। पर एक शर्त पर।”

“क्या शर्त?”

“करण, तुम रोज सुबह सर को लाइब्रेरी ले जाओगे और शाम को वापस। यह तुम्हारी ड्यूटी होगी। और मैं भी हर हफ्ते आऊँगा सर से मिलने।”

करण की आँखों में खुशी के आँसू थे। प्रोफेसर सर ने दोनों हाथ ऊपर उठा दिए – “बस, आज मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो गया।”

उस दिन के बाद से मेरी जिंदगी बदल गई। मैं हर रविवार सर के पास जाता हूँ। कभी नेहा को लेकर, कभी बच्चों को लेकर। सर अब अकेले नहीं हैं। उनके पास दो बेटे हैं – एक करण, एक मैं।

करण आज हमारी कंपनी में अकाउंट्स ऑफिसर है। वही कंपनी की गाड़ी से रोज सुबह सर को लाइब्रेरी ले जाता है। मैंने उसे प्रमोशन दे दिया है, पर वह अब भी वही इंसान है – मददगार, नेकदिल, संस्कारी।

प्रोफेसर सर की किताब अब छप चुकी है- ‘शिक्षा का दर्पण’। उसकी भूमिका में उन्होंने लिखा है – “यह किताब मेरे उन सभी शिष्यों को समर्पित है जिन्होंने मुझे सिखाया कि गुरु-शिष्य का रिश्ता सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होता। यह दिलों का रिश्ता होता है।”

कल रविवार था। मैं,नेहा, बच्चे और करण – सब सर के घर इकट्ठा थे। सर ने अपने हाथों से पकौड़े बनाए थे। नेहा ने सलाद काटा। बच्चे सर की गोद में बैठे कहानियाँ सुन रहे थे।

शाम को जब हम लौट रहे थे, करण ने कहा: “साहब, एक बात पूछूँ?”

“हाँ करण?”

“उस दिन अगर मैं उस आंटी को नहीं उठाता, तो क्या हम कभी सर से मिल पाते?”

मैंने सोचा। “शायद नहीं।”

“तो साहब, कभी-कभी छोटी-छोटी देर, छोटे-छोटे लोग, बड़े-बड़े मौके लेकर आते हैं। है ना?”

मैंने करण के कंधे पर हाथ रखा। “करण, तुम छोटे नहीं हो। तुम तो सबसे बड़े हो। दिल के सबसे बड़े।”

उस रात सोते समय नेहा ने पूछा – “आज इतने खुश क्यों हो?”

मैंने कहा – “आज मुझे एहसास हुआ कि असली सफलता वो नहीं जो तुम्हारे बैंक बैलेंस में है। असली सफलता वो है जो तुम्हारे दिल में बसी है। और असली अमीर वो हैं जिनके पास बड़ा दिल है, चाहे उनके पास कुछ भी न हो।”

आज मैं जान गया हूँ कि ‘छोटे लोग’ वो नहीं होते जो काम से छोटे हैं। ‘छोटे लोग’ वो होते हैं जो एहसान भूल जाते हैं। और ‘बड़े लोग’ वो होते हैं जो अपने गुरुओं को कभी नहीं भूलते – चाहे वो ऑटो चालक हों, चाहे प्रोफेसर, चाहे कोई और।

धन्यवाद, करण। धन्यवाद, प्रोफेसर सर। आपने मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया।

जय श्री राम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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