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अर्जुन ने जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा क्यों की

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अर्जुन ने जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा क्यों की

जयद्रथ ने अभिमन्यु को एक खरोंच भी नहीं लगाई थी फिर भी अर्जुन ने उसको मारने की प्रतिज्ञा क्यों ली?…. ये बहुत ही रोमांचक प्रसंग आज की कहानी में पढ़िए…एक जीवन बदल देने वाला संदेश!

सबसे पहले यह समझें कि जयद्रथ कौन था?….वो दुर्योधन की बहन का पति था, जब पांडव वनवास में थे तब दुर्योधन ने ऋषि दुर्वासा को पांडवों के पास भेजा ताकि वह क्रोधित होकर पांडवों को श्राप दे देंगे ।

जब उसका यह पैंतरा असफल हो गया तब उसने जयद्रथ को भड़का कर पांडवों के पास भेजा। जयद्रथ ने मौका देखा जब कोई भी पांडव आस पास नहीं था तब उसने द्रौपदी का हरण कर लिया और उसको लेकर अपने राज्य की तरफ़ रथ से भाग निकला। अर्जुन और भीम ने उसको रास्ते में ही पकड़ लिया,भीम ने उसके सिर के बाल जगह-जगह से काट दिए और उस को जमकर पीटा पर युधिष्ठिर ने दया दिखाते हुए जयद्रथ को जीवित छोड़ दिया!!

कहा जाता है कि इसके बाद जयद्रथ ने महादेव की तपस्या की और यह वरदान प्राप्त किया कि एक दिन के लिए अर्जुन को छोड़कर वह सभी पांडवों पर भारी पड़ेगा।

महाभारत युद्ध के तेरहवें दिन जब गुरु द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की, तो सुशर्मा नाम के राजा ने अर्जुन को बड़ी चालाकी से युद्ध भूमि के एक हिस्से में अटका लिया ताकि चक्रव्यूह से युधिस्ठिर को बन्दी बनाया जा सके।

बचे हुए पांडव दल में यह योजना बनी की अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ना तो जानता है वह अंदर घुसते जाएगा और बाकी लोग उसके पीछे- पीछे चक्रव्यूह में घुसकर चक्रव्यूह को अंदर से तोड़ देंगे। अभिमन्यु तो अंदर चला गया पर बाकी लोगों को जयद्रथ और उसकी सेना ने किसी तरह से बाहर ही रोक दिया।

अब इसमें अभिमन्यु के चक्रव्यूह तोड़ने की क्षमता जिम्मेदार थी या बाकी लोगों को चक्रव्यूह की जानकारी नहीं होना या जयद्रथ की एक दिन की वीरता का वरदान !! यह अपनी-अपनी सोच है।

मुझे तो लगता है कि बाकी लोग चक्रव्यूह तोड़ना नहीं जानते थे इसलिए वह उसके दरवाजे पर अटक गए इसमें जयद्रथ के वरदान का कोई हाथ नहीं था। क्योंकि पाण्डवों के अलावा धृष्टधुम्न,सात्यकि जैसे योद्धा भी थे जो जयद्रथ को आसानी से हरा सकते थे वो भी असफल रहे क्योंकि चक्रव्यूह को तोड़ना नही जानते थे। ये कारनामा जयद्रथ की औकात के बाहर का था इसलिए महादेव से मिले वरदान की कहानी बन गई।

बाकी कहानी तो हम जानते ही हैं कि अभिमन्यु का वध कई लोगों ने मिलकर किया। अब मेरे प्रश्न मेरे मन में प्रश्न यह उठता है की अर्जुन ने जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा क्यों की। जबकि अभिमन्यु का वध तो चक्रव्यूह के अंदर हुआ था वहां पर तो जयद्रथ उपस्थित भी नहीं था।

वास्तव में जिन महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु का वध किया था , वो कैसे भी हों पर युद्ध भूमि में वीर थे। उनमें से किसी को भी अभिमन्यु के वध पर गर्व तो नहीं ही हुआ होगा। चूंकि वह बहुत ज्यादा उग्र हो रहा था कौरवों की सेना को मार रहा था इसलिए सबको मिलकर उसका वध करना पड़ा। इसलिए उस दिन किसी ने अपनी वीरता पर गाल नहीं बजाए होंगे। जबकि जयद्रथ सबको जा जाकर सुना रहा होगा कि किस तरह उसने कई पांडव योद्धाओं को चक्रव्यू के द्वार पर ही रोक लिया इसलिए अंदर के लोग अभिमन्यु का आखेट कर पाए। इसी तरह की बातें अर्जुन के कान में पड़ी और पांडव अभिमन्यु की सहायता के लिए पीछे-पीछे जा रहे थे, लेकिन जयद्रथ ने उन्हें व्यूह के द्वार पर ही रोक लिया। जिससे वे अभिमन्यु को कोई सहायता नहीं पहुंच सके। इसलिए उसने अगले दिन के सूर्यास्त से पहले जयद्रथ के वध की प्रतिज्ञा की ताकि अभिमन्यु वध का यश जयद्रथ को न मिले।

अगले दिन सारी कौरव सेना का एक ही लक्ष्य था कि जयद्रथ को किसी भी तरह शाम तक जिंदा रखें । जब दुर्योधन को अर्जुन की भीषण प्रतिज्ञा का पता चला, तो वह डर गया। द्रोणाचार्य ने जयद्रथ को बचाने के लिए तीन परतों वाला सैन्य चक्र बनाया।

सबसे आगे शकट व्यूह, बीच में चक्रव्यूह और अंत में पद्मव्यूह। जयद्रथ को इन तीनों व्यूहों के सबसे पिछले हिस्से में, यानी अर्जुन से मीलों दूर रखा गया, जहाँ हज़ारों योद्धा और हाथी उसकी सुरक्षा में तैनात थे।

अर्जुन के पास सूर्यास्त तक का ही समय था। उस दिन अर्जुन ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। मार्ग में द्रोणाचार्य, दुर्योधन और कर्ण जैसे योद्धाओं ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन किसी से उलझने के बजाय गांडीव से रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ते रहे। श्रीकृष्ण ने रथ को इतनी कुशलता से चलाया कि वे शाम तक जयद्रथ के करीब पहुँच गए, लेकिन तब तक सूर्य अस्ताचल की ओर झुक चुका था। उस दिन अर्जुन और बाकी पाण्डवों ने मिलकर सहस्त्रों कौरव सैनिकों को मार दिया, सर्वाधिक विनाश हुआ।

जैसे-जैसे शाम हुई, जयद्रथ और कौरव सेना में उत्साह बढ़ने लगा क्योंकि अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा के हारने के करीब थे। तभी श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से सूर्य को बादलों के पीछे छिपा दिया। चारों ओर अंधेरा छा गया और ऐसा लगा मानो सूर्यास्त हो गया हो। यह देख कौरव सेना खुशी से झूम उठी। अर्जुन ने गांडीव नीचे रख दिया और अग्नि समाधि की तैयारी करने लगे।

जयद्रथ, जो अब तक डरा हुआ छिपा था, अर्जुन को जलता हुआ देखने की उत्सुकता में सबसे आगे निकल आया और अट्टहास कर ज़ोर से हंसने लगा।

जैसे ही जयद्रथ अर्जुन के ठीक सामने आया, श्रीकृष्ण ने बादलों को हटा दिया और सूर्य फिर से चमकने लगा। अभी सूर्यास्त नहीं हुआ था! श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा–”पार्थ! सूर्य अभी अस्त नहीं हुआ है। वह देखो जयद्रथ तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और इसका मस्तक धड़ से अलग कर दो!” अंततः जयद्रथ भी मारा गया।

जयद्रथ को मारना इतना सरल नहीं था। उसके पिता वृद्धक्षत्र ने उसे वरदान दिया था कि “जो भी जयद्रथ का मस्तक पृथ्वी पर गिराएगा, उसके अपने सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएंगे।”

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निर्देश दिया कि बाण इस प्रकार चलाओ कि जयद्रथ का सिर सीधे उसके पिता की गोद में जाकर गिरे, जो पास के ही आश्रम में तपस्या कर रहे थे। अर्जुन ने वैसा ही किया। जब वृद्धक्षत्र अपनी तपस्या से उठे, तो जयद्रथ का सिर उनकी गोद से नीचे गिर गया और उसी क्षण उनके अपने सिर के भी सौ टुकड़े हो गए।

इस तरह की प्रतिज्ञाएं हमेशा परेशानी लाती हैं, अगर सिर्फ अर्जुन और जयद्रथ का द्वंद युद्ध होता तो 15 मिनट में फैसला हो जाता पर न तो जयद्रथ इस चुनौती को स्वीकार करता न ही दुर्योधन ऐसा होने देता।

कृष्ण कभी इस तरह की प्रतिज्ञाओं के पक्ष में नहीं रहते थे, वो “विजिगीषु” थे मतलब विजय की इच्छा रखने वाला । अधर्मियों पर विजय सबसे बड़ा ध्येय था। मुझे तो लगता है अगर उस दिन अर्जुन जयद्रथ का वध नहीं कर पाता तो स्वयं श्री कृष्ण शस्त्र धारण करके युद्ध ही खत्म कर देते।

कभी-कभी अपराध कर्म से नहीं, भूमिका से तय होता है, जयद्रथ ने अभिमन्यु पर शस्त्र नहीं उठाया, पर उसने उसे अकेला किया। जीवन में कई बार हम सीधे गलत नहीं करते, लेकिन किसी गलत को संभव बना देते हैंऔर वही सबसे बड़ा अपराध होता है।

अन्याय का यश पाना, अन्याय करने से भी बड़ा पाप है, अर्जुन ने जयद्रथ को इसलिए नहीं मारा कि उसने अभिमन्यु को मारा था, बल्कि इसलिए कि वह उस अन्याय का श्रेय ले रहा था। गलत कार्य का ढिंढोरा पीटना, अधर्म को और भी घातक बना देता है।

 प्रतिज्ञा भावनाओं में ली जाए तो पूरे युद्ध को भड़का देती हैं, अर्जुन की प्रतिज्ञा ने एक दिन में सबसे अधिक रक्तपात कराया। इससे शिक्षा मिलती है कि आवेश में लिया गया संकल्प अक्सर अपने उद्देश्य से ज्यादा विनाश लाता है।

 रणनीति और धैर्य, शक्ति से अधिक प्रभावशाली होते हैं, अर्जुन की विजय केवल पराक्रम से नहीं हुईबल्कि श्रीकृष्ण की बुद्धि, समय-ज्ञान और रणनीति से हुई।

जीवन में केवल ताकत नहीं, सही समय और सही निर्णय जीत दिलाते हैं।  धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी नियमों से ऊपर उठना पड़ता है सूर्य को छिपाना, वरदान को मोड़ना—ये सब नियमों से बाहर थे, पर अधर्म के अंत के लिए आवश्यक थे।

कृष्ण यह सिखाते हैं कि नियम धर्म के लिए हैं, धर्म नियमों के लिए नहीं। जो अन्याय को रोक सकता है और फिर भी रोकता नही है वह भी अन्यायी ही कहलाता है

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जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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