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मनहूस

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मनहूस

एक राज्य में एक साधारण-सा व्यक्ति रहता था। उसका कोई अपराध नहीं था, न ही उसने कभी किसी का अहित किया था। परंतु दुर्भाग्य वश उसके बारे में यह बात मशहूर हो गई थी कि उसका चेहरा मनहूस है। लोग मानने लगे थे कि उसे देखने से दिन बिगड़ जाता है, काम बिगड़ जाते हैं और अनहोनी हो जाती है। बिना सत्य जाने बिना परखे लोगों ने उसे दोषी ठहरा दिया।

धीरे धीरे यह बात राजा तक पहुँची।जनता की शिकायतें सुनकर राजा ने सोचा अंध विश्वास के आधार पर किसी को दोषी ठहराना ठीक नहीं। पहले स्वयं सत्य जानना चाहिए। राजा ने उस व्यक्ति को महल बुलवाया और कुछ दिनों तक वहीं रहने का आदेश दिया।

एक दिन राजा ने निश्चय किया कि वह स्वयं प्रातःकाल उस व्यक्ति का मुख देखेगा। उसी सुबह किसी कारणवश राजा अत्यंत व्यस्त हो गया और दिन भर भोजन न कर सका। शाम होते-होते राजा ने निष्कर्ष निकाल लिया कि व्यक्ति का चेहरा वास्तव में मनहूस है। क्रोध और भ्रम में आकर राजा ने जल्लाद को बुलाया और उस निर्दोष व्यक्ति को मृत्युदंड देने का आदेश दे दिया। जब यह आदेश मंत्री ने सुना तो वह चकित रह गया। उसने साहस जुटाकर राजा से पूछा महाराज! इस व्यक्ति का अपराध क्या है?

राजा बोला आज सबसे पहले मैंने इसका मुख देखा और मुझे दिन भर भोजन नहीं मिला। इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि यह मनहूस है? मंत्री ने विनम्रता से कहा “महाराज क्षमा करें। आज प्रातः सबसे पहले इस व्यक्ति ने भी आपका ही मुख देखा था। आपको तो केवल भोजन नहीं मिला, लेकिन आपके मुखदर्शन से इसे प्राणदंड मिल रहा है। अब आप ही निर्णय करें कि मनहूस कौन है?”

राजा यह सुनकर स्तब्ध रह गया। उसने कभी इस दृष्टि से सोचा ही नहीं था। मंत्री ने आगे कहा राजन्! किसी का चेहरा मनहूस नहीं होता। वह तो ईश्वर की देन है। मनहूस तो हमारी सोच, हमारी दृष्टि और हमारा पूर्वाग्रह होता है। राजा को अपनी भूल का आभास हुआ। उसने तुरंत उस व्यक्ति को मुक्त कर दिया और जनता को भी यह समझाया कि बिना जांच पड़ताल, बिना आत्म चिंतन किसी को दोषी ठहराना सबसे बड़ा अन्याय है।

दूसरों की आलोचना करने से पहले हमें अपनी सोच की पड़ताल करनी चाहिए। मनहूसियत किसी चेहरे में नहीं, हमारी नकारात्मक दृष्टि में होती है। बिना सत्य जाने किसी को दोषी ठहराना न केवल अन्याय है, बल्कि हमारे विवेक की भी परीक्षा है। सही निर्णय वही है जो तर्क, करुणा और आत्म चिंतन पर आधारित हो।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

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  • कहावत है कि बुरे से नहीं बुराई से बचना चाहिए

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