lalittripathi@rediffmail.com
Stories

घर का सम्मान

161Views

घर का सम्मान

भाभी, आपने कहाँ पहनी होगी इतनी महँगी जयपुरी साड़ी?”……सुमन इस घर में नई नहीं थी। दस साल हो चुके थे उसे इस घर की बहू बने। जब वह पहली बार इस घर में आई थी, तब उसके हाथों में चूड़ियाँ कम और सपने ज़्यादा थे।

मायके में उसके पिता एक छोटे-से दर्जी थे, माँ गृहिणी। सुमन ने बचपन से ही सीखा था कि कम में भी खुश कैसे रहा जाता है। शादी में कोई बड़ा दहेज नहीं आया था, न ही कोई शोर-शराबा। बस सादगी और भरोसे के साथ वह इस घर में आई थी। सासू माँ ने शुरू में उसे अपनाया, पति रमेश ने हमेशा साथ देने का वादा किया, लेकिन ननद राधा—उसकी आँखों में शुरू से ही एक अजीब-सी कसक थी।

राधा पढ़ी-लिखी थी, शहर में नौकरी करती थी, और उसे लगता था कि घर की बहू को भी उसी के स्तर का होना चाहिए। सुमन का सादा रहन-सहन, उसकी कम बोलने की आदत, और हर बात में समझौता कर लेने का स्वभाव राधा को कमज़ोरी लगता था।

 वह अक्सर छोटी-छोटी बातों में ताने मार देती—कभी कपड़ों पर, कभी खाने पर, कभी सुमन की चुप्पी पर। सुमन सुन लेती, मन में रख लेती, पर जवाब नहीं देती। उसे लगता था कि घर की शांति उसके चुप रहने से बनी रहती है।

समय बीतता गया। रमेश की नौकरी में उतार-चढ़ाव आए। कई बार महीनों तक ठीक से तनख़्वाह नहीं मिली। उन दिनों सुमन ने अपने गहने एक-एक कर गिरवी रख दिए। उसने कभी रमेश से शिकायत नहीं की, न सासू माँ को बताया। वह घर के खर्च को ऐसे संभालती जैसे कोई अनुभवी नाविक तूफ़ान में नाव संभालता हैधीरे, समझदारी से। राधा तब भी ताने मारती, “भाभी, आपके मायके से तो कुछ खास आया नहीं, सब भाई ही देख रहे हैं।” सुमन बस मुस्कुरा देती।

उस जयपुरी साड़ी की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। वह कोई अचानक की शौक़ीन ख़रीद नहीं थी। महीनों पहले सुमन ने घर के खर्च से थोड़ा-थोड़ा बचाना शुरू किया था। कभी सब्ज़ी सस्ती मिल गई तो बचा लिया, कभी अपने लिए कुछ नहीं लिया। वह जानती थी कि सासू माँ की साठवीं सालगिरह आने वाली है। सासू माँ को जयपुरी साड़ियाँ बहुत पसंद थीं। सुमन चाहती थी कि इस बार वह अपनी सास को कुछ ऐसा दे जो सिर्फ़ कपड़ा न हो, बल्कि सम्मान और प्यार की चादर हो।

उसने शहर के एक छोटे-से बाज़ार में जाकर वह साड़ी खरीदी। दुकानदार ने दाम बताया तो सुमन ने बिना मोलभाव के पैसे दे दिए। उसके लिए वह साड़ी महँगी थी, पर सासू माँ की मुस्कान उससे कहीं ज़्यादा कीमती। घर आकर उसने साड़ी को अलमारी में सहेजकर रखा, मानो कोई अनमोल ख़ज़ाना हो। उसने किसी को नहीं बताया—न रमेश को, न राधा को। वह चाहती थी कि यह तोहफ़ा चुपचाप अपने अर्थ बोले।

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। सासू माँ की सालगिरह से दो दिन पहले घर में मेहमान आए। राधा भी शहर से आई हुई थी। उसने अलमारी खोली और साड़ी देख ली। उसकी आँखें चमक उठींपर चमक में खुशी नहीं, जलन थी। उसी पल उसने तंज कस दिया, “भाभी, आपने कहाँ पहनी होगी इतनी महँगी जयपुरी साड़ी?” मानो वह कह रही होतुम्हारी औक़ात से बाहर है।

आँगन में सन्नाटा छा गया। रमेश कुछ बोलने ही वाला था कि सुमन ने उसे इशारे से रोक दिया। उसने शांति से कहा, “राधा, यह साड़ी मैंने पहनी नहीं है।” उसकी आवाज़ में कोई कटुता नहीं थी, बस सच्चाई थी। राधा हँस दी, “तो फिर किसके लिए है? माँ के लिए? इतना महँगा तोहफ़ा?” उसके शब्दों में सवाल कम, शक ज़्यादा था।

सुमन ने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी कि हर जवाब शब्दों से नहीं दिया जाता। अगले दिन सासू माँ की सालगिरह आई। घर सजा हुआ था। सुमन ने सासू माँ को वही जयपुरी साड़ी पहनाई। सासू माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने साड़ी को छूते हुए कहा, “बहू, यह तो बहुत सुंदर हैपर इतनी महँगी क्यों?” सुमन ने बस इतना कहा, “माँ, आपके लिए है।

उस पल सासू माँ ने सुमन को गले लगा लिया। भीड़ में खड़ी राधा यह सब देख रही थी। पहली बार उसके दिल में कुछ चुभा। उसे याद आया—जब भाई की नौकरी ठीक नहीं थी, तब कौन घर संभाल रहा था। जब माँ बीमार थीं, तब कौन रात-रात भर जागा था। सुमन की सादगी अब उसे कमज़ोरी नहीं, ताक़त लगने लगी।

शाम को सासू माँ ने सबके सामने कहा, “आज अगर यह घर संभला है, तो सुमन की वजह से। उसने कभी अपनी इच्छा को हमारे ऊपर नहीं रखा।” राधा की आँखें झुक गईं। उसे अपनी बात याद आई—“आपने कहाँ पहनी होगी इतनी महँगी जयपुरी साड़ी?” वह शब्द अब उसके कानों में गूँज रहे थे, शर्म बनकर।

रात को राधा सुमन के कमरे में आई। उसकी आवाज़ धीमी थी, “भाभी, मुझसे गलती हो गई। मैंने आपको समझा नहीं।सुमन ने उसकी ओर देखा, आँखों में कोई शिकायत नहीं थी। उसने कहा, “राधा, रिश्ते कपड़ों से नहीं, दिल से पहने जाते हैं।राधा रो पड़ी। उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि सुमन की चुप्पी कमज़ोरी नहीं थी, बल्कि रिश्तों को बचाने की ताक़त थी ।

जयपुरी साड़ी अब सिर्फ़ एक साड़ी नहीं रही। वह उस घर में सम्मान, समझ और बदलते दिलों की पहचान बन गई। और सुमन—वह आज भी वैसी ही थी: सादी, शांत, पर भीतर से बेहद मजबूत ।

कहानी अच्छी लगे तो Like और Comment जरुर करें। यदि पोस्ट पसन्द आये तो Follow & Share अवश्य करें ।

जय श्रीराम

Lalit Tripathi
the authorLalit Tripathi
सामान्य (ऑर्डिनरी) इंसान की असमान्य (एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी) इंसान बनने की यात्रा

1 Comment

Leave a Reply